Saturday, August 19, 2017

Answer to Swami Achintananad Ji Maharaj by Rohtas

       क्या विचारशून्य अवस्था सम्भव है का शेष भाग

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मेरे मालिक आप की जय हो !

Answer to :---

Swami Shree Achintyananad Ji Maharaj

                  आप जो जानना चाहें जानें जो पूछना चाहें पूछें ! प्रशन्न में विचारशून्य होने की बात है जीवन मुक्त होने की बात नहीं फिर भी हम प्रभू कृपा से अपने विचार रख रहे हैं इसका मतलब है प्राकतिक गूणो से मुक्त होना विचार मुक्त होना है, प्रकृति के पांच तत्व के गुण व अवगुण दोनों से मुक्त होना पडेगा, जब ही शून्य अवस्था आती है काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार, अहंभाव, मन, बुद्धी और ज्ञान, इन सब गुणों से जीव जब विकार मुक्त होगा तभी गुणातीत होगा और जब गुणातीत होगा वही अवस्था विचारशून्य मानी जायगी, लेकिन यहां पर जीव की चेतन अवस्था है अत: जीव का इस अवस्था में चेतनता होनी अति आवश्यक है उह अवस्था ज्यादा देर नही रह सकती इसके साथ साथ साथ चेतन्ता के रहते हुए आप मेहनत करते हुए आगे ," काष्ट- सिद्धी " को प्रभू कृपा होने पर प्राप्त कर सकते हैं ।अगर इससे आगे आप और मेहनत करते हैं तो continuously बैठक लगाने पर प्रभू कृपा होने पर, " अमृत-रस-पान " का आनन्द ले सकते हो। और इसके बाद यहां पर परमपिता प्रमात्मा आपको दिव्यता प्रदान करते हुए विवेक शक्ति की प्रदान कर सकते हैं और विवेकी परुष कहलाने गौर्व प्राप्त हो जाता है । अब दिव्यता का प्रतीक होने पर दिव्य अनुभूतियों का आनन्द ले सकते हैं और अब यहां जीव दिव्य कृपा पात्रता का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं और दिव्य पुरुष कहलाने का गौरव प्राप्त कर लेते हैं यहां पर जिवात्मा गुणातित होने पर शून्य अवस्था होने पर मुक्ति पद् की प्रापति भी हो रही है इसलिये यहां जीव ज्याद समय मुक्त नहीं रह सकता अनर्थ हो सकता है, यहां शरीर का भी ध्यान रखना पडता है लेकिन भगवान बडे दयालू होते हैं अपने परम भग्त का एक बाल भी बांगा नही होने देते अपनी परम कृपा बनाये रखते हैं  यहां पर जीव के मुक्त होते ही भगवान उसको दोबारा से जीवन प्रदान करते हैं या कभी कभी भगवान अपने दिवय प्रारूप शरीर से अवतरित हो जाते हैं और इस प्रकार अब वह गुणातीत शरीर अवतरित आत्मा के रहते अवतारी पुरुष कहलाने का गौरव भी प्रापत कर लेता है अर्थात शून्य अवस्था होने पर दिवय गुण अवतरित होने पर दिवय पुरुष, दिव्य आत्मा अवतरित होने पर अवतारी पुरुष और मालिक से योग भी हो सकता है कुछ क्षण के लिये ऐसे में योगी पुरुष कहलाने हकदार हो जाता है। " बहुत कठिन है डगर पनघट की "! फिर भी लग्नेषू व अनन्य भग्ति द्वारा परम सनेही भग्तजन के लिये बहुत आसान है।

     "यह सब हम व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही लिख रहे हैं"

                                दास अनुदास रोहतास

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Answer to Rohtas by Swami Achintananad Ji Maharaj :-----Face-book *****
Answer by रोहतास जी :---
                  (अवतारी पुरूष आप के अनुसार) राम राम जी, आप ने जो अपने अनुभव के आधार पर परमात्मा के बारे मे व्यख्या की है उस से यह लगता है कि आप ने परमपिता परमात्मा के सब लोकों को देखा जाना और समझा है ! जितना आप जानते हैं उस जानने की अवस्था तक पहुंचने के लिए अभी तो मैंने प्रवेश ही नहीं लिया है !
जब मैं इस जानने वाली कक्षा मे प्रवेश प्राप्त कर लूंगा तब आप से कुछ पुछने या जानने के लिए प्रश्न करुँगा !
तब तक के लिए ____
     
                            जय श्री राम

               Hearty Parnams Maharaj Ji

Friday, August 18, 2017

क्या विचारशून्य होना् सम्भव है ?

                 क्या विचारशून्य होना सम्भव है ?


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प्रशन्न पूछें****ऊत्तर पाऐं****शंका समाधान***** Facebook
Que:----  Prakhar Kumar Ji. ***********

Answer by Rohtas:--*****In Brief *****

जय श्री राम जी,
                 श्रीमान जी, " हां ", क्षणमात्र के लिये, सम्भव है वो भी, परम स्नेही, लग्नेषू, जिज्ञाषू, योगी पुरुष और भगवान के अनन्य परम भग्त के लिये। यह अवस्था जीव के गुणातीत हो, स्थितप्रज्ञ होने पर ही सम्भव है। Stability is very complsory.
सावधान:----
                शून्य अवस्था में प्रभू कृपा अति आवश्यक है और लम्बे समय के शून्य में अनर्थ भी हो सकता है इस लिये ध्यान से, बहुत सुन्दर अवस्था है यहिं से जीव को दिव्यता का अनुभव और दिव्यानन्द होने की अनूभूतियां होने की कृपा का अवसर भगवान प्रदान करते हैं।
उपाय:---
              योगा, प्राणायाम शारीरिक अक्षर्शाईज और ध्यान का अभ्यास continuously, शून्य अवस्था तक क्रमश: करते रहना बहुत जरूरी हैं स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिये।
सुझाव:----
             परम स्नेही भग्तजन को शून्य अवस्था के साथ-साथ लगे हाथ काष्ट-सिद्धी योग और अमृत-रसपान कर लेना चाहिये, क्योंकि इन तीनों योग कृयाओं का आपस में घहरा सम्बन्ध है और साथ-साथ ही हो जाती हैं और प्रभू कृपा होने पर जीव को दिव्य आनन्द और दिव्यता प्राप्त हो जाती है।
 समाधान:-----
              जब परम स्नेही भग्तजन अनन्य भग्ति करता हुआ, योग सिद्धी कृयाओं की, इन तीनों अवस्थाओं को अनुभव कर, प्रभू कृपा द्वारा दिव्यता को प्राप्त कर लेता है, तो विवेक की प्राप्ती हो जाती है जिससे धीरे धीरे शभि दिव्य अनुभूतियां को अनुभव कर, तुरिया शक्ति द्वारा बेतर्णी को पार करता हुआ, परम लक्ष की प्राप्ती कर, सभी अध्यात्मिक जगत की शंकाओं का समधान करता हुआ, प्रभू जी से योग होने पर, परम शान्ती को पा परम धामको प्राप्त कर आनन्दित होता हुआ, अंत में मोक्ष को प्राप्त कर लेता है जो जीवन का मुख्य उद्देश्य है।

       * Yet its the Matter of Self Realization *

                  * प्रभू हम सब पर कृपा बनाय रखे। *

                                                  दास अनुदास रोहतास

Thursday, August 17, 2017

Source Of All Religions Is Ego

Simon Rowe's Question :--


Que:- What is the Source of all Religions ?

Answer by Rohtas :-----

                           EGO

             Due to unsimilarity in Thoughts, because Ego is the root of all religion.
                                         
                                   Das Anudas Rohtas

अध्यात्मिक जगत में कौनसा मार्ग ज्यादा उपयुक्त है भग्ति मारग या ज्ञान मार्ग

शिक्षा चौहान- अध्यात्मिक सागर प्रशन्नोत्तरी शंशंका समाधान
ऊत्तर by रोहतास -
                  🌼 भग्ति मार्ग सर्वश्रेष्ट मार्ग 🌼



जय श्री कृष्णा,
                श्रीमसन जी यहां पर कुछ मार्मिक शब्द उपयुक्त होने चहिये जैसे अध्यात्मिकता के आधार पर कौनशा योग मार्ग, भग्तियोग मार्ग या ज्ञानयोग मार्ग में से कौनसा  योग मार्ग उपयुक्त है जिसको हम अपने जीवन में अपनाए जो सर्वस्रेष्ट मार्ग हो जिससे प्रभू के दिवय रूप के दर्शन हो सकें, या प्रभू का साक्षात्कार हो जाय। " हमने पहले भी लिखा है प्रशन्न सही होगा तो उसका ऊत्तर सही मिलेगा।" दूसरी ओर अगर हम भगवान तक जाने की बात करें तो * भगवान तो नित्य प्राप्त हैं * कहीं जाने का स्वाल ही पैदा नहीं होता हां Its a Matter of Self Realization . यह तो व्यक्तिगत अनुभव का विषय है अर्थात अध्यात्मिकता के आधार से लें, तो भग्ति मार्ग ही सर्वश्रेष्ट मार्ग हैं भगवान केवल भग्ति से ही प्रशन्न हो कर प्रकट हो अपने भग्त को आनन्दविभोर होने का अवसर प्रदान कर सकते हैं
       वह इस लिये कि कर्म योग, ज्ञान योग, सांख्य योग, लययोग, हठयोग, नाम योग, भग्तियोग कोई भी योग हो अर्थात भग्ति में कोई भी मार्ग हो ध्यान योग के बिना सब अधूरे हैं दिव्य अनुभव केवल ध्यान योग से ही अनुभव होना सम्भव है और ध्यान योग भग्तियोग का ही महत्वपूर्ण अंश है इसलिये भग्तियोग सर्वश्रेष्ट योग है सर्वश्रेष्ट मार्ग है। भगवान के परम भग्त, लग्नेषू, जिज्ञाषू, परम स्नेही भग्त जन प्राय:, जबसे सृस्टि बनी आजतक, भग्तिमार्ग ही अपनाते आये है और अपने अध्यात्मिक जीवन मे अन्तर्मुखी होते हुए दिव्य अनुभव प्राप्त कर, भग्ति का आनन्द ले, शान्ति प्रिय: जीवन व्यतित करते आय हैं जिससे विष्व में शान्तिप्रिय: वातावर्ण का सक्षम होना सम्भव है और जो हमारे जीवन का परम लक्ष भी है।
          जहां तक साक्षातकार की बात है यह भी हर युग में भगवान अपने परम भग्त की भग्ति पूर्ण होने पर साकार रूप में अपने भग्त के समक्ष उसे प्रोत्साहित करने हेतू कुछ क्षण के लिये प्रकट होते आय हैं अब भी वर्तमान युग कलयुग में भगवान साकार रूप में साक्षात रूप में प्रकट हो चुके हैं लेकिन यह सब अनन्य भग्ति करने पर ही सम्भव हुआ है इसलिये अध्यात्मिकता के आधार पर भग्तिमार्ग ही सर्वस्रेष्ट मार्ग है। 
    धन्यवाद सहित                          
                                 दास अनुदास रोहतास

मोक्ष क्या है ?

      Krishna Krishna - अध्यात्मिक सागर प्रशन्नोत्री शंका-समधान
  

                      मोक्ष क्या है ? 
              


प्रशन्न :---मोक्ष का तात्पर्य क्या है और क्या मोक्ष मरने के बाद ही प्राप्त हो सकता है ?
ऊत्तर by रोहतास
संक्षिप्त में,
आदर्णिय श्रीमान जी,
                    मोक्ष जीव को जीते जी अर्थात जीवनकाल में ही अनन्य भग्ति द्वारा प्रभू कृपा होने पर ही ( केवल मोक्ष प्राप्ती का अधिकार ) भगवान जीव को यानी अपने परम भग्त को प्रदान कर उस जीव को (rebirth) होने पर किसी सवर्ग आदि सुन्दर दिव्यलोक में सुरक्षित स्थान प्रदान कर देते हैं और इस प्रकार मोक्ष प्राप्त सभी जीव आत्माऐं महाप्रलया के समय अपने मोक्ष प्राप्त अधिकार का सद्उपयोग करते हुए, परम आत्मा में संलिप्त होने पर मोक्ष को प्राप्त हो जाती हैं जब से सृष्टि बनी आजतक देवी, देवता, और तो क्या ब्रह्मा, विष्णु, महेष, आदि महानत्तम आत्माओं तक किसी को भी मोक्ष नहीं मिला हां सभी को मोक्ष अधिकार प्राप्त हैं और सभी महान आत्माऐं या तो उन्हें इस सुन्दर सृस्टि में किसी न किसी लोक का स्वामित्व सोंप दिया जाता है या फिर सवर्ग आदि, दिव्य सुन्दर लोकों में सुरक्षित परम आनन्दित हैं। जिन्हें केवल भगवान के परम भग्त, लग्नेषू , जिज्ञाषू, योगीपुरुष, या अवतारी पुरुष दिव्य चक्षूओं की सहायता से प्रभू कृपा होने पर ही, अन्र्तर्मुखी होते हुए अनुभव कर सकते हैं।
ध्यान रहे :-
                 1. मृत्यु   स्थूल   शरीर  की होती है
                 2. मुक्ति  सूक्षम  शरीर  की होती है
                 3. मोक्ष कारण शरीर को मिलता है

     अध्यात्मिक सच्चाई
                                                    दास अनुदास रोहतास

क्या पता कौन स्वर्ग जाएगा कौन नर्क

प्रशन्न Sivendra Gupta :-
            क्या पता कौन स्वर्ग जाएगा कौन नर्क और इनकी वास्तविक सत्ता है भी या नहीं ?

उत्तर by रोहतास :---

              * We Must Go To Heaven * 


श्रीमान जी नमस्ते,

            भग्वन्ता व महात्मना स्वर्ग में मर कर नहीं जाते जिंदा ही जाते है, भग्वन्ता जीते जी भग्ति करते है , भग्वन्ता जीते जी मुक्त होते हैं और जीते जी भगवान का कृपापात्र हो, मोक्षपद् का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं और भगवान अपनी कृपा कर इन महात्मनों को स्वर्ग आदि ऊंचे धाम, ऊंचे लोको में स्थानान्तरित कर देते हैं, जो महाप्रलया तक आनन्दित रह सुख भोगते हैं या प्रभू इच्छा अनुसार किसी दिव्य लोक का स्वामित्व भी प्रदान कर देते हैं और अंत में सृष्टि के मध्य प्रभू लीला अवलोकन कर, परम शान्ति को प्राप्त होते हैं।

        जय सच्चिदा्नन्द।
                      Om Shanti Om
                                    दास अनुदास रोहतास

Saturday, August 5, 2017

Swagatam in Spirituality

Welcome in Spitituality


                                                   Das Anudas Rohtas