Sunday, March 30, 2014

* भगवान श्री त्रिलोकी के नाथ * हैं तीनों लोकों के स्वामी *

                                * श्री त्रिलोकी के नाथ *
                                    -----------------------
            अब हम ऐसे भगवान जिनका अध्यात्म जगत में विशेष स्थान हैं, भगवान श्री त्रिलोकी के नाथ जी,  जिनके पास तीनों लोकों का स्वामित्व है, और सारे जहां व तीनों लोकों और सभी सृस्टियों स्थूल व सुक्षम के आधार हैं और उन्हें प्रकाशित कर रहे हैं, एक इमेज द्वारा दर्शाने का प्रयास करते हैं, जो हमें परमपिता प्रमेश्ववर द्वारा विशेष कृपा होने पर, स्वेरे खडी अवस्था में पूजा के समय ध्यानयोग द्वारा, २९-३-२०१४,  ८-५० पर, शरीर में भृकुटि के मध्य, स्थित दिव्य ब्रह्मण्ड, " Internal Divine Universe " में अनुभव हुआ । प्रयास करने पर विश्व के सभी प्राणी, विशेषकर मानव, एक लम्बे और गहरे भग्तिमय ध्यानयोग अभ्यास,  दृड निश्चय के साथ गुणातीत हो, स्थिर-प्रज्ञ बन (परम कृपा पात्र के रूप में)  अन्तरमुखी होते हुए, अपने Internal Divine Universe में, केवल भग्वत् कृपा प्राप्त होने पर ही, Supreme Divine Soul " NIRAKARA, " व परम दिव्य लीला अवलोकन कर, अपने जीवन में परम आनन्द प्राप्त कर सकते हैं, जो अनुभव निम्न इमेज द्वारा दर्शाया गया है :-

                      " ऊमां    कहूं   मैं,  अनुभव  अपना, "
                      " सत्य हरी भजन जगत सब सपना।"
                                       *********
Not:-
A Divine Supreme Power, Divine Light, seems originated like a water-ball,"Bulbula," from this Dot, " Shuksham-Bindh, " & enlightments the World and may be become incarnate in the World.
Two Planet entered very quickly in" Adhisthan " at once at 8-50,on 2-4-2014, observed in this image.

1. Dot.                              
2. Chetten Tatav. 
3. RIng "Divine-Power"
4. Tatav                         
5. Adhisthan
6. Internal Divine Universe
7. Physical Body

 !  Param Loka
!!  Purshottam Loka "Adhisthan"
!!! Purush Loka"Shiv Loka"        
!!!! Srishti  "physical-World"
                                                दास अनुदास रोहतास




Friday, March 28, 2014

* SPIRITUAL TRUTH *

                   Spiritual Truth
                       **********
      

          Likhwaney Waley Bhagvan hey
                Likhwa      Rahey    Din    Raat
                      Log Bharam Ham per karey
                              Ham Bhaye  Das  Anudas

        
               
                                         Das Anudas Rohtas

Sunday, March 23, 2014

* अवतारी पुरुष * परम शक्ति का अवतर्ण *

                          अवतारी - पुरुष     
                            ----------------
                             * अवतार *
                                ---------

              Hinduism के अनुसार सनातन धर्म में अध्यातमिक दृष्टि से आत्मिक तत्त्व को पुरुष शब्द से सम्बोथित किया गया है ( अवतारी पुरुष से अभिप्राय:- अवतरित आत्मा )

              भगवान की शक्ति के अवतरण का रहस्य जब से इस सुन्दर सृष्टि की उत्पत्ति हुई तब से लेकर आज तक बना हुआ है । हिन्दु्िईजम के अनुसार भगवान की परम शक्ति ने हर युग में इस पवित्र धरा पर समयानुसार भिन्न भिन्न योनियों जैसा कि बारह:, कच्छ, मत्तष्य, शेषनाग, सिंह और मानव आदि रूपों में अवतार धारण किया है ।सतयुग में राजा श्री सत्यवादी हरिष्चन्द्र जी धर्म के अवतार, त्रेता में श्री राम जी प्रसोत्तम के अवतार, दू्ापर में श्री कृष्ण जी परम के अवतार हुए और अब कलयुग में भी भगवान की शक्ति ने महाअवतार के रूप में मानव शरीर धारण कर लिया है जिसे अवतारी पुरष के नाम से जाना जाता हैं। यह अवतारी पुरुष देखने में आम साधारण पुरुष की तरह ही लगता है लेकिन वास्तव में उसके पास एक दिव्य शक्ति अवतरित होती है जिसे एक अन्य अवतारी पुरुष दिव्य पुरुष जो भगवान के कृपा पात्र होते हैं अन्तर्मुखी होने पर अनुभव कर सकते हैं ऐसे महापुरुष विष्व मे अब भी हैं लेकिन वो हमारे अनुभव से बाहर हैं ।हर युग में अवतारी पुरुषों का जीवन बडा Torchable चेतावनी भरा रहा है । लेकिन अवतारी पुरुष सब कुछ सहन करता हुआ अपने दिव्य उद्धेश्यों की पूर्ती को मध्य नजर रखते हुए अपने लक्ष की ओर अग्रसर होता हुआ भगवद् प्राप्ती करता है ।

      * अवतारी पुरुष और साधारण पुरुष में अन्तर *


  
                 अवतारी पुरुष और साधारण पुरुष में जो अन्तर है उसको समझने का प्रयास करते हैं ।अध्यात्मिक जगत में शरीर रूपी सृष्टि की रचना । Tatav, Soul, निराकार " शूक्ष्म  बिन्द " कारण शरीर जाना जाता है।  प्रकाशमय शरीर जो एक गुलाबी रंग के दिव्य सत्व गुणों के प्रकाश से बना " ज्ञानमय शरीर " (प्यूपा की शेप में) LARWA के आकार का होता है जिसे " ज्योतिर्मय " शरीर भी कहते है यह देवताओं के अनुभव में ही आता है मायावी प्रकाश-बिम्भ के समान, शरीर है इस लिये बहुत कम  अनुभव में आता है। जिवात्मा " (तत्व+ प्राकृतिक गुणों के प्रभावित विकारों से सठीं आत्म-तत्व, जो काम क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मन, बुद्धी और अहंभाव, गुणों का बन्धन, जिवात्मा हैं जो सूक्षम शरीर है। प्रकृतिक तत्वों से निर्मित शरीर (आकाश+वायु+जल+अग्नि+पृथवी ) स्थूल शरीर है। इस प्रकार Now, Physical Body is :- Tatav+Natural Virtues+Natural Elements  अर्थात कारण, सूक्षमं, और स्थूल यह शरीर रूपी सृष्टि की रचना है यहां तक पुरुष और अवतारी पुरुष की रचना में कोई विशेष अन्तर नहीं है अब अवतार विंग क्या है यह जानना पडेगा । सृष्टि की रचना एक नियमबद्ध रचना है जिसके अनुसार Gravity-power के अाधार पर वायु तत्व वायु की ओर, पृथ्वी तत्व पृथ्वी की ओर, जल तत्व जल की ओर, अग्नि तत्व अग्नि की ओर और आकाश तत्व आकाश की ओर आकृषित होते हैं, ठीक उसी प्रकार आत्म तत्व, परम आत्म तत्व की ओर आकृषित होता है पर यह आकृषित होने वाली एक दूसरे के साथ योग की  क्रिया तत्वों के एक दूसरे के पवित्र होने तक ही सीमित है ।

   उधाहरण:-

                   हवा का पानी में न मिलना  
                   आग का पानी में न मिलना
                   आकाश का तत्वों मे न मिलना
                   पृथ्वी का अग्नि से न मिलना
                   हवा का पृथ्वी में न मिलना

               अत: जैसे इन पांचों प्राकृतिक तत्वों का आपस में योग नहीं हो सकता है ठीक उसी प्रकार आत्म तत्व का और प्राकृतिक गुणों के विकारों का भी कोई मेल नहीं केवल एक प्रभावी बन्धन होता है, आत्म तत्व पर प्राकृतिक गुणों काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मन, बूध्दी और अहंभाव, के विकारों के बन्धन को यहां जीवात्मा कहा जाता है ।

  अध्यात्मिक जगत के अनुसार हमारे शरीर रूपी सृष्टि की        रचना :------


                          * साधारण पुरुष *
                               *********
                     तत्व. + जीवात्मा + प्रकृति
                     कारण+सूक्षमं+स्थूल शरीर
    
                       यहां तक सब जानते हैं लेकिन जब सृष्टि का मंथन होता है तो परम आत्म तत्व जो चेतन तत्व है और जिसकी आटोमैटिक दिव्य उत्पत्ती होती है, इसके साथ साथ एक दिव्य शक्ति के रूप में रिंग भी सुरक्षा कवच के रूप में स्वयेंव प्रकट होता  है यह पूर्णतय: दिव्य हैं इसके बारे में तत्व विश्लेषण में जिक्र कर चुके हैं । अब स्वयं निरन्तर  शारीरिक प्रयास दू्ारा योगा, प्राणायाम, द्रिड निष्चय और लंबे समय तक लगातार ध्यान योग दू्ारा स्थिरप्रज्ञ होते हुए जीवात्मा के गुणातीत होने पर तत्व का परम तत्व से योग होता है ।

      * मुक्ति पद् * :-
           *****
                       यहां पर जीवात्मा के गुणातीत होने पर जीव (तत्व) के virtuousless होने पर जीव मुक्त हो रहा है " विशेष सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि जीवन मुक्त भी हो सकता है "। लेकिन भगवान बहुत दयालू हैं अपने परम भग्त का विशेष ध्यान रखते हैं। परम भग्त के  गुणातीत होने पर परम तत्व के सभी दिव्य गुण अाटोमैटिकली अवतरित हो जाते हैं और साथ में दिव्य रिंग भी अवतरित हो जाता हैं जो परम की विशेष दिव्य शक्ति और विवेक प्राप्त हो जाता है।यहां पर भी एक विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि परमपिता प्रमात्मा, सर्वशक्तिमान स्वयं अवतरित नहीं होते, अत: परम आत्मा ही अपने में से ठीक अपने अनुरूप, with His All Divine Qualities (सर्व-दिव्यगुण-सम्पन्न) सभी दिव्य गुणों और दिव्य शक्तियों सहित एक Formatted God एक प्रारूप भगवान की रचना रचते हैं जिसे अधिदेव ( अदि -गोड, अधिस्थान भी कहते है ) यहां इनका भी दिव्य शरीर है, तत्व +gravity power, त्रीगुणधारी+रींग, फिर वह Formatted Supreme Soul ," God "और इसके दिव्य गुण अवतरित होते है और बार बार हर युग में महाप्रलया तक इसी परम आत्मा का प्रारूप ही अवतरित होता है। और अवतार धारण करता है ।


                      * अवतारी पुरुष *
                           *********
                   
 * परम आत्म तत्व + दिव्य रिंग + दिव्य गुणमय सूक्षमं            शरीर + स्थूल शरीर *

    उदाहरण :- ------        

                 वास्तव में देखा जाय इस सुन्दर सृष्टि में सभी जीव प्राणीयों को पवित्र आत्म तत्व नित्य प्राप्त हैं सभी की नीयम बद्ध रचना है और सभी अवतारी पुरुष हैं फिर भी अवतारी पुरुष एक विशेष दिव्य अनुभवी आत्मा होती है।   जिस प्रकार कोइ सरिता का पानी जब समुद्र में जा कर मिलता है उसका अपना अस्तित्व छूट जाता है और फिर वह सरिता का पानी न रहकर समुद्र को अपनाने के बाद समुद्र का पानी हो जाता है और समुद्र के सभी गुण व्याप्त हो जाते है, जो हमने " Mumukshu " में दर्शाया हुआ है। ठीक उसी प्रकार साधारण शरीर में भी आत्म तत्व के पवित्र होने, * गुणातीत * होने पर परमात्मा से योग होने पर, परम के चर्ण स्पर्ष होने पर, परम का प्यार भरा आशिर्वाद पा लेने पर, परम के सभी दिव्य गुण अवतरित हो जाते हैं और फिर यह  साधारण दिखने वाला पुरुष फिर अवतारी पुरुष कहलाने का गौरव प्राप्त कर लेता है ।

                * मोक्ष पद्ध * :--------
                   *******

                 पूर्ण विश्व में कोई भी प्राणी किसी भी योनी में किसी   भी काल में गुणातीत होने पर दिव्य शक्तियों के योग होने पर शंस्यरहित मोक्ष पद् पाने का अधिकार रखता है । क्योंकि परम शक्ति, परम आत्म तत्व," निरअाकारा " से योग का होना ही मोक्ष कहा जाता है यह केवल प्रभू इच्छा पर निर्भर करता है ( यहां पर एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है बता देता हूं सावधानी बरतनी चाहिये यहां पर जीव After surrender to God, "Tatav" जीव प्रकृतिक गुणों के बन्धन से मुक्त होने जा रहा है, और जब जीव गुणातीत होता है उस वक्त जीवात्मा कुछ क्षण के लिये मुक्त होता है और यह हमेशा के लिये भी मुक्त हो सकता है, (अनर्थ भी हो सकता है) पर यहां भगवान बडे दयालू भी हैं और कृपालु भी हैं वो अपने कृपापात्र, परम भग्त पर विशेष कृपा कर पुन: परम दिव्य आत्मा अवतरित होने की कृपा करते है जिससे अब दिव्यता प्राप्त होने पर परम दिव्य गुणो की प्राप्ती हो जाती है ) और इसी प्रकार कोइ भी जीव या पुरुष गुणातीत होने पर समुद्र रूपी परम के सभी गुण प्राप्त कर अवतारी पुरुष कहलाने का अधिकार रखता है। यहां केवल आत्मा का परम आत्मा से योग हुआ है, क्योकि सूक्षमं शरीर दिव्य गुणो का है और भौतिक शरीर वही है इस लिये यह एक साधारण पुरुष ही नजर आता है । महापुरुष अपने दिव्य नेत्रों से या मन की आंखों से दिव्य पुरुष को कहीं पर बैठे हुए अवलोकन कर लेते हैं और गुप्त रूप में मिलते भी हैं । और भगवान के दिव्य गुणो का रसपान ग्रहण कर विश्व में रहते हुए दिव्य लीला अवलोकन कर दिव्य परम आनन्द को प्राप्त होते है ।

      * अवतारी पुरुष *:- ------
           *******          

                 " आत्म तत्व के गुणातीत होने पर आज तक जब से सृस्टि बनी मोक्ष किसी को भी और तो और क्या ब्रहम्रा विष्णु महेष  God -Goddess व हर युग में जो अवतारी पुरुष, महान आत्माऐं हुई उनको भी मोक्ष नहीं मिला। इसका विशेष कारण है क्योंकि किसी एक आत्मतत्व को अगर मोक्ष मिलता है तो सृष्टिचक्र टूट जाता है जबकि सृष्टि की नियमबद्ध रचना है, इस लिये मोक्ष किसी को भी नहीं मिलता। " दिव्यता प्राप्त परम तत्व व आंशिक तत्व सभी के मोक्षपद् महाप्रलया तक सुर्क्षित होते हैं । हां केवल मोक्षपद् का अधिकार प्राप्त हुआ है क्योंकि तत्व परम तत्व का ही अंश है," And  Tatav is Immortal,  और मोक्ष होने पर या तो सूक्षम प्रलय का कारण बनता है या फिर विष्व में प्रलयकाल जैसा विनाश होता है  और परमतत्व Supreme Soul का मोक्ष होने पर तो महाप्रलया ही हो जाती है ।" ऐसे में या तो स्वर्ग आदि दिव्य लोकों के सुख और यदि स्वर्ग का सुख पहले ही भोग लिया हो फिर परमपिताप्रमात्मा अपनी लीला अवलोकन करवा, ऐसे तत्वों को किसी लोक या मृत्युलोक अर्थात इस पवित्र धरा का स्वामित्व प्रदान कर एक अवतारी पुरुष के रूप में शुभ कर्म् करने हेतू सम्मानित  कर पुन:, भगवत् कार्य को आगे बढाने, विश्व में शान्ती स्थापित करने और विष्व कल्यान हेतू इस सुसृस्टि में अपने परम कृपापात्र को मोक्ष की बजाय संजीवन प्रदान करते हैं और स्थुल शरीर छोडने पर ऐसी महान आत्माऐं महाप्रलया तक उंचे पदों पर सूख भोगते हुए सृस्टि के अंत में मोक्ष पद् को प्राप्त होती हैं । " सृस्टि की नियमबद्ध रचना है, ध्यान रहे भगवान तो भगवान हैं, कोई भी प्राणी ऐसी गलती न करे अपने आप को भगवान ही समझ बैठे, भगवान तो अपने अंश पर स्थाई व स्थिर रूप से महाप्रलया तक दिव्य केन्द्र बिन्द,"DOT" पर स्थित हो इस सुन्दर सृस्टि को रोशनमय करने हेतू विद्धमान हैं, अवतर्ण के समय विश्व में केवल उनका प्रारूप ही अवतरित होता हैं । 

  विशेष:-

                       वर्तमान युग में भी इस सुसृष्टि में इस अद्धभुत पवित्र धरा पर परम शक्ति ने अपने सभी दिव्य गुणों और दिव्य शक्तियों सहित भारत देश में महा-अवतार के रूप में अवतार धारण कर बहुत ही सुन्दर दिव्य, साकार, मोहनी रूप, " मानुषमं-रूपं " में साक्षात् प्रकट हो चुके हैं और कुछ समय तक हमारे बीच मे रह सुदर्शन दे अन्तर्ध्यान हो गये यह कटु सत्य है अौर confirm है ।आज तक जो भी लिखा गया है व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही लिखा गया है कृपया लिखने मैं कोइ गलती हो तुच्छ समझ कर माफ कर देना ।

    "  सादर प्रणाम  "

   Self Spiritual Realization and Universal       Truth.
                      * Maha-Raj-Yog *                                    

                                  दास अनुदास रोहतास

Wednesday, March 19, 2014

* सृस्टि की रचना *

   !   * ब्रह्म सूत्र वायु *

                   साष्त्रानुसार सृस्टि के रचिता श्री ब्रह्मा जी को माना गया है । देवआदिदेव, परब्रह्मप्रमेष्वर, परमपिता प्रमात्मा, सृस्टि को रचने से पहले सबसे पहले स्वयं, अपने अनुरूप अपने में से दिव्य गुणों से भरपूर एक फोरमेटड गौड की रचना करते हैं जिसे अधिदेव " नारायण " भी कहते है यही अधिदेव, त्रिगुणधारी, तीनो गुणो से भरपूर" ब्रह्मा, विष्णु, महेष " त्रिदेव की रचना करते हैं और फिर ब्रह्मा जी सृस्टि की रचना करते हैं ।त्रेता युग में जब प्रसौत्तम पुरुष के रूप में श्री राम जी ने अवतार धारण किया उस काल में राजा जनक जी जो कि एक ब्रह्मज्ञानी राजा थे एक राजयषश्वी यज्ञ का आयोजन किया और उसमें एक प्रशन्न रखा गया था, " ब्रह्मसूत्र क्या है " जिसके उत्तर में ऋषि अष्टावक्र जी ने सही उत्तर दिया:-
                                 * ब्रह्म सूत्र वायु है *
                फिर भी सृस्टि का रहस्य आज तक नही सुलझ पाया । क्योंकि खाली वायु से सृस्टि की रचना नहीं हुई,  वायु तो केवल एक तत्व है जो इसकी रचना का एक मात्र हिस्सा है जिसके जानने से हम एक गुण के प्रभाव को ही जान सकते हैं ।

   !!  * परम सूत्र आत्मा *

                 सृस्टि की रचना में तत्व का बहुत महत्व है समस्त अध्यात्म जगत का आधार तत्व ही है जिसको आत्म तत्व माना गया है इस तत्व का स्वामित्व श्री विष्णु जी के पास ही है त्रिमूर्ति भगवान का यह एक दिव्य गुण है भगवान विष्णु इस के माध्यम से सृस्टि का पालन करते हैं । दु्ापर युग में श्री कृष्णा विष्णु के अवतार हुए जो परम तत्व के अवतार थे। श्री कृष्णा ने अपने परम मित्र धनुरधारी अर्जुन को दु्ापर मे विराट रूप दिखाया जिसमें जिवात्माओं को अपने सृष्टि रूपी शरीर में शरीर के हर दू्ार से आते जाते दर्शाया गया है ।अब भी वायु तत्व और आत्म तत्व दो के योग से भी सृस्टि का रहस्य यूं का त्युं ही बना हुआ है।

    !!!   * शिव सूत्र H2-O - जल *
         
                   सृ्स्टि की उत्पत्ति में जल का विशेष महत्व क्योंकि प्रकृति का सबसे महत्वशील तत्व जल है। जल से ही वास्त्व में देखा जाए सृस्टि की उत्पत्ति हुइ है त्रिमूर्ति भगवान के तीसरे गुण श्रंगहार का स्वामित्व श्री महेष जी (भगवान श्री शिवा) के पास हैं और जल के माध्यम से ही जब महाप्रलया होती है केवल जल ही बचता है और इतना ही नहीं जल भी अग्नि यानी तेज दु्ारा वाष्प बन कर हवा में उड जाता है ।जिससे त्रीमूर्ती भगवान के तीसरे गुण की पुस्टी हो जाती है लेकिन अकेले जल तत्व से भी सृस्टि की रचना नही हुई ।अत: भगवान के तीनों दिव्य गुणों के तत्वों के योग होने से ही शायद् सृस्टि की रचना सम्भव हो सकती है ।

!!!!   * परब्रह्म: सूत्र = चेत्तन तत्त्व *

                     * ब्रह्म सुत्र वायु + परम सुत्र आत्मा *       
                                  + सृस्टि मात्र जल +
                                         चेत्तन तत्त्व
                                            *****
                    इन तीनों तत्वों के योग से प्रकृति और चोथा चेतन तत्त्व + होने से सृष्टि " नरतन " बना जो नर से नारायण बनने में सक्षम होने की योग्यता रखतस है। लगता है, यह रहस्य जो आज तक जब से सृस्टि बनी बना हुआ है, खुलने जा रहा है । देवादिदेव त्रिदेव भगवान की तीनों गुणो के आधार पर तीनो शक्तियो का योग होने पर नारायण भगवान का पूर्ण रूप सम्भव है बर्ह्म सुत्र वायु है हर जगह विद्धमान है + जल से प्रकृति सम्भव है +आत्म तत्व, से जीव की उत्पति सम्भव है । अत: (आत्मा) पुरुष + प्रकृति :- इन दोनों तत्वो के योग से सृस्टि की रचना सम्भव है। अब हमारी सृस्टि की रचना तत्व विष्लेषण के आधार पर निश्चित रूप से संम्भव हो गई है अत: वर्तमान युग कलयुग में सृस्टि ( सूक्षमं रूप से मानव शरीर रूपी सृस्टि ) की रचना के बारे में जो रहस्य बना हुआ था अब कोई रहस्य नही है ।प्रकृति के तत्वो के दिव्य गुणों (Divine-Virtues) चेतन तत्व, रिंग, के बन्धन में बंधा आत्म तत्व ही देव जीवात्मा है जिसे इनके मुक्त होने तक बार बार जीव रूपी बन्धन मे बंध कर बार बार जन्म मरण के चक्कर मे अनेक योनियों में आना  जाना पडता है तत्व कारण शरीर है ( इसे शरीरी भी कहते है) । सूक्षमं शरीर, प्राकृतिक गुणों" Natural- Virtues " (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मन, बुद्धी, अहंभाव) के विकारो के बन्धन से बंधा तत्व इसे जीवात्मा भी कहते है और प्राकृतिक तत्वों "Natural- Elements "(आकाश, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी)  से बंधने पर जीवात्मा यह हमारा स्थूल शरीर है । सृस्टि मे जो वन्य प्राणी है उनके अधिकार क्षेत्र सिमित हैं, और मनुष्य देह मे अधिकार क्षेत्र ज्यादा है इस योनी मे अत: जीव नर तन में कुछ नया करने की क्षमता रखता है और अपने मानव शरीर रूपी सृस्टि में रहकर अन्तर्मुखी होते हुए, श्री नारायण भगवान की खोज कर, जो हमे नित्य प्राप्त हैं, सुदर्शन प्राप्त कर,  उनकी शरण को प्राप्त होना ही वास्तव में मानव सत्धयर्म है और उद्धेश्य है ।
    जय श्री राम
                                        * Raj-Yog *

                                                 दास अनुदास रोहतास

भगवान का रहस्य

                            * भगवान  का  रहस्य *
                                    ---------------
                    जब से सुसृष्टि की उत्पत्ति हुई तभी से भगवान की उत्पत्ति का रहस्य भी इस अद्भुभुत संसार में बना हुआ है । हमारे अवतारी पुराषों दिव्य पुरुषों व देव शक्तियों के दर्शाये अनुभवों के आधार पर ऐसा  लग रहा है मानो भगवान के प्रति जो हमारा प्रेम सच्ची लग्न है हो सकता उस में कोई कमी रही हो हम इस रहस्य को नहीं समझ पा रहे। भगवान तो अपने भग्त के प्रति बहुत ही दयालू और कृपालु होते हैं भगवान का और भग्त का तो इस संसार में हर युग से बहुत् ही गहरा रिस्ता देखने को मिला है इतिहास इस तथ्य का ग्वाह  है ।इतना ही नहीं इस वि़ष्व में जितना भगवान का परम भग्त भगवान को पाने के लिये व्याकुल होता है भगवान भी अपने सच्चे भग्त को अपनाने के लिये उससे भी हजार गुणा ज्यादा व्याकुल होते हैं इतने बडे संसार में भगवान खुद शर्मसार हो जाते हैं भग्त के न पाने पर और एक दिन युगयुगान्तर के बाद भगवान का उस के सच्चे भग्त से मेल हो ही जाता है और भगवान फिर इस सुसृस्टि में अपने भग्त को रिझाने हेतू सुन्दर लीला रचते हैं।अब भगवान का रहस्य, भगवान है या नहीं, और है तो भगवान कैसे है, भगवान की उत्पत्ति कैसे हुइ, के बारे में लिखने का प्रयास करते हैं जो निम्न है :-
      भगवान की उत्पत्ति:-
            *********
                           सृस्टि की नीयम बद् रचना है ।भगवान की उत्पत्ति इस सुसृष्टि में  पूर्ण रूप से दिव्य है क्योकि सृसष्टि की रचना भी स्वयेंव और पूर्णतय: दिव्य है । महाप्रलया के युगयुगान्तर के बाद अर्थात करोडों वर्षों के बाद  जब सृष्टि परिपक्व हो जाती है तो शान्त पडे इस ब्रह्माण्ड में सव्येंव एक तीव्र गति से हलचल उत्पन्न होती है जो धीरे धीरे एक बहुत भयंकर ब्लैक-हौल का रूप धारण कर लेता है इस के घेराव में ब्रह्माण्ड के सभी प्रकार के तत्व होते हैं जो बहुत तीव्र गति से चक्र लगाते रहते हैं कुछ समय के बाद प्राकृतिक तत्वों के आपस में टकराने से इस में एक जबरदस्त विस्फोट होता है जिसमें से एक बहुत भयंकर आकाशनुमां बिजली की तरह चमकती भयंकर आग की लंभी ऊंची,  लपट पैदा होती है ( विशेष:- जो ऊपर आशमान की ओर जाती है फिर यह ऊपर एक गलैक्सी का रूप धारण कर लेती है )। यहीं से हमारी सुसृष्टि की रचना होती है सभी ग्रह उपग्रह चांद, तारे, सूर्य, प्लानट, जल, वायु, तेज, पवित्र धरा, तत्व, सभी शक्तियां ओर इन्हीं सभी तत्वों के केवल उनके गुणों की शक्तियां ओर दिव्यता के आधार पर प्रकट होने वाली शक्ति " ग्रेवटी शक्ति के कारण अपने अंश पर स्थित हो जाते हैं" इन सभी शक्तियों का केंद्र बिन्दू जो एक चमकीले तारे की तरह प्रकट होकर सबसे ऊपर स्थित होकर चमकता उसे परम तत्व, परम शक्ति, परम आत्म तत्व " निराकार " के नाम से जाना जाता है। सबसे पहले उत्तपन्न होने वाला यही तत्व है।"यह स्वयेंव उत्तपन्न पूर्ण दिव्य है यह अपना कोई भी रूप बदल सकता है क्योंकि सृष्टि की कुल  सामग्री के दिव्य गुणों का केन्द्र बिन्दू है यह थलचर, जलचर, नभचर, किसी भी जीव का रूप धारण करने की क्षमता रखता है।यह क्षण में प्रकट होने वाला है और क्षण भंगुर है। इसके साथ साथ चेतन तत्व और सुरक्षा कवच के रूप में रिंग की उत्पत्ति होती है । ये तीनों दिव्य तत्व एक साथ प्रकट होते हैं । इसमें रिंग प्राकृतिक तत्वों के दिव्य गुणों जो गुप्त रूप में विद्धमान होते हैं उन्ही से बना होता है यह भी दिव्य रूप में प्रकट होता है जो " अधिदेव " के नाम से जाने जाते है।इन तीनों दिव्य शक्तियों के सहयोग से ही भगवान साकार रूप में हम सब के बीच में इस सुसृस्टि में  " नारायण " के रूप में प्रकट होते हैं । यहां पर तीनों शक्तियों के होते त्रीमूरती, त्रिदेव, त्रीगुणी मायाधारी के नाम से भी जाने जाते हैं ।और ब्रह्मा, विषणु, महेष आदि दिव्य साकार रूप में प्रकट होते हैं ।ब्रह्मा जी सृस्टि की रचना करते हैं, विष्णु जी पालन करते हैं, और महेष जी षंहार करते हैं ।
     विशेष-
       *****
                       वर्तमान युग में भी भगवान अपने अति सुन्दर दिव्य साकार रूप " मानुषमं-रूपं " मायावी, मोहनी रूप में साक्षात् रूप से प्रकट हुए हैं । हिंदू सभ्यता में आज भी एतिहास ग्वाह है हर युग में हमारे महापुरुषों, अवतारी पुरुषों, ऋषियों, मुनियों, दिव्य पुरुषों ने इस संसार में समय समय पर इस पवित्र धरा पर अलग अलग रूप में इन दिव्य अनुभूतियों का अनुभव हुआ है और भविष्य मे भी इसी प्रकार होता रहेगा ।*
     

                                                      दास अनुदास रोहतास

Sunday, March 16, 2014

TRUE WORSHIP OF GOD " NARAYANA "

             TRUE  WORSHIP  OF  GOD

               तत:      पदं     तत्परिमार्गितव्यं
               यस्मिन्गता   न    निवर्तन्ति भूय: ।
               तमेव     चाद्यं     पुरुषं      प्रपद्ये
               यत:    प्रवृत्ति:    प्रसृता   पुराणों ।

 Tatah     Padam    Tatprimargitavyam,
 Yesmingata   Na   nivertanti  Bhuvyah.
 Tmava Chadhyam Pursham Parpadhe,
 Yatah   Parvrittih    preshrita   Purano.

              Lord Krishna gave a message in His sweet divine song in Shree Madbhagavadgita in Davapar - Yuge in Chapter 15, sloka 4, that  being concioisness, virtuousless with fast determination, thoughtless and stable mind during meditation, we should diligently seek our Lord, Supreme State " The Almighty God " having reached which one never returns, in this beautiful world. So we should seek and refuge in the Primal Parson (Narayana) from whom has emanated this beginingless flow of creation in this wonderful World and meditate on Him.
V.V. Imp:-
              Lord Krishna explains here that " I also seek & refuge in Him, " NARAYANA " The God.

                                         Das Anudss Rohtas


              

Tuesday, March 11, 2014

* SRISHTI JUST WATER *

                      Srishti Just Water
                          --------------------                                               Physicaly Spiritually and Scientifically terms the creation of the Universe billions of years is after only water and water-borne organism Mahaperlaya the Prawn which defeats the sacred privilege of being the first step was Lobster (Zingah). So all the living creatures upon Earth in this beautiful Srishti are after metamorphosis of  Forms of a Zingah. In this way, we all beings in the World today deserved the blessing of lobster (Zingah). We all being in the world today, the blessing of the shrimp in the Srishti overland Nvcr, jlcrsbi prani occurred after the origination Shrimp and the subscquent creation of humanity. Now this is also clear that all the male master incarnated divine men, great men and avatari Purush are the blessing of this lobster.

                         Water= H2-O
                          ************

Monday, March 10, 2014

Rajyog



 Rajyog

Secrecy of the Tatav yoga "God"

1. Supreme "Tatav" center point of powers as a "DOT"

2. Supreme Soul 

3. Supreme Power" Ring. " ,outer safety ring

All these three Supreme TATAV appeared automatically From &
After Monthon all Tatavs of the Shristi then become like a great Black Hole like Galaxy in Universe and become the cause of a great Blast in this galaxy and appeared a strange light and run out upper side in the universe and then Originat  automaticuly divine Supreme Tatav Divine Supreme power & divine outer Ring Power forcly in the centre of that Hole.
Supreme Tatav + Soul + Ring
1 + 2 + 3 
Raj-yog (Secrecy of Supreme Tatav )
-" God "---------
Shree Madhbhagwat Gita

Das Rohtas

Thursday, March 6, 2014

* सुसृष्टि में अदभुत धरा पर पहला कदम *

         
           * पवित्र धरा पर पहला कदम रखने वाला जीव झिंगा *
सुन्दर सृष्टि में इस अति पवित्र एवं अदभुत धरा पर सबसे पहले अपने नन्हे नाजुक और श्रेष्ठ कदम रखने का सौभाग्य जिस जीव को प्राप्त हुआ उसका नाम है

                                        *  झिंगा  *
                                             

                                            दास अनुदास रोहतास

Monday, March 3, 2014

* त्रीमूरती भगवान के दर्शन *

                    त्रीगुणी माया धारी       
                      ---------------
                 त्रीमूरती भगवान के रूप के दर्शन इस संसार में किसी विरले महापुरुष को  ही  हो पाते हैं। केवल अवतारी पुरुष दिव्य पुरुष, या एक योगी पुरुष ही कर सकता है  ध्यानयोग की मुद्रा में हमें जो त्रीमूरती भगवान के दर्शन हुए वो निम्न लिखत रुप में हुए जो चित्र में  दर्शाए गये है । यह ही परम ज्योत है ओर यह ही ज्योती स्वरूप भगवान हैं।ं
                                       दास रोहतास


Sunday, March 2, 2014

* अवतारी पुरुष का भारत में प्रगट होना *

                   " भगवान ओर भगत "
                       ----------------
          भगवान तो जहां उसका परम भगत होता है वहीं पर अवतरित होते बस वह अषने भगत के दीवाने होते हैं ओर परम भगत केवल भगवान का दीवाना होता है दोनो मानो दुनिया में एक दूसरे के लिये ही बने हैं   अध्यात्मिक जगत में दोनो का अपना  ही स्थान है जो राज योग का विषय है। युग युगान्तर के बाद इन दोनो का सहज योग होता है जो  एक अलोकिक योग होता है। भगवान अन्तरयामी होते हैं वो दिव्यता की मूर्त हैं  वह सब जानते हैं वह पारस हैं जो अपने भगत को भी अपने अनुरुप पुर्ण दिव्य गुणो से भरपूर बना देते हैं फिर भी भगवान तो भगवान हैं ओर कोई भगवान नहीं हो सकता ओर न ही उमीद रखनी चाहिये।
                भगवान का भगत बचपन से ही दिव्यता का कभी कभी अनुभव तो करता है पर कम आयु मे दिव्य शक्तियों को अनुभव में लाना इतना सहज नहीं होता, इस लिये अभ्यास की विशेष जरुरत होती है जो भगत समय के रहते  कर लेता है ओर वक्त आने पर जब भगवान देखता है मेरा भगत परिपक्व हो गया है ओर शक्ति के अनुरुप तैयार है भगवान शक्तियों को युगों के बाद सब के बीच मे छोडता जो एक लग्नेषु परम भगत ही कैच करता है जो सालों से सच्ची लग्न योग प्रयास ओर विशेषकर भगवान की दयालुता ओर उसके शुभ आशिर्वाद का फल है एक भगत परम भग्ति पाने मेंकामयाब हो भगवन दर्शन प्राप्ती में समर्थता हासिल कर अपना जीवन सफल बना भव सागर को पार कर जाता हैं।
                               दास अनुदास रोहतास

* महा-अवतार *


                           " भगवान का अवतरण "
                                  ------------------
              भगवान ने वर्तमान युग कल युग मे बहुत सुन्दर सरल रुप " मानुषमं-रुपमं " के रुप में विश्व में अवतार धारण कर लिया है। भगवान 9-17 मी: पर रात्री में सन 1996 मे प्रगट हुए। यह एक राजयोग है जिसके बारे में गुप्त रहना होता है वैसे भी यह आम प्राणी की सूज से बाहर का विषय है फिर भी हम संंक्षिप्त रुप से लिखने का प्रयास करतें हैं।
भगवान:-
              भगवान के बारे में अनेक मत सुनने को मिलते है जो स्वभाविक है ओर हो भी क्यों नहीं क्योंकि यह हर प्राणी की समझ से बाहर का विषय है। भगवान निराकार हैं, भगवान दिव्य हैं, भगवान की आटोमैटिक सुन्दरतमं दिव्य उत्पति है, भगवान एक सूक्षम बिन्द के समान है, भगवान कोहनूर हीरे की तरह चमकने वाला मूख्य तत्व है,भगवान पूरण दिव्य है,भगवान अनासवान है, भगवान क्षण में प्रगट होते हैं, भगवान क्षण भंगुर हैं। फिर भी भगवान कभी अवतार नहीं लेते। हमेशा फोरमेटड गोड ही विश्व में अवतार धारण करते है ।
फोरमेटड गोड:---
                  भगवान अपनेआप अपने अनुरुप सेम अपने जैसा अपने मे से सभी दिव्य गुणों से भरपूर सर्व गुण सम्पन्न सर्वशक्तिमान फोरमेटड गोड.की  सुन्दर रचना  रचते हैं  जो पूर्ण सूक्षम स्थूल शरीर के समान होता है ओर टोटली दिव्य होता है यही शरीर संसार में किसी व्यक्ति विशेष का स्थूल शरीर अपनाकर अवतार लेता है। यह शरीर अनासवान होता है यही स्रिस्टी की रचना करता है ओर संहार करने में भी पुरण सक्षम है ओर महाप्रलय तक बार बार जब भी प्रीथ्वी पर पाप बढता है धर्म की हानी होती है यही शरीर अवतार धारण करता है।
                 भगवान सर्वशक्तिमान हैं। आदिकाल मैं जब महा विष्फोट के बाद सृष्टि के आरम्भ में सभी तत्व उत्पन्न होते हैं ओर सव्भाविकली जब तत्व ग्रेवीटी मंथन होता है सभी शक्तियां तभी से प्रगट भयि होती हैं उसी समय मुख्य तत्व की ओर सभी दिव्य शक्तियों की उत्पति होती है। परम आत्म तत्व Atom, चेतन तत् और मुख्य शक्ति" रिंग " जिसे आदि शक्ति " अधिष्ठान " कहतें है, सब एक समय उत्पन्न होती हैं। यह सभी फोरमेटड गोड को भी प्राप्त होती हैं
                 यहां भी भगवान के सभी शरीर " कारण, सूक्षम, सथुल, दिव्य होते हैं के सहित अवतरित होते हैं । दवापर में श्री क्रष्षा के कथनानुसार कि जब भी प्रीथ्वी पर पाप बढता है ओर धर्म की हानी होती है उस समय मैं साकार रुप में लोगों के सम्मुख प्रगट होता हुं। साधू पुरुसों का उद्धार करने के लिये ओर पाप कमों का विनाश करने के लिये ओर धर्म की अच्छी तरह स्थापना करने के लिये युग युग में प्रगट हुआ करता हूं। और साकार रूप " मानूसमं -रूपं " में प्रगट हो चुके हैं जैसा के नीचे ईमेज में दर्शाया गया है।



                                                  दास अनुदास रोहतास


Saturday, March 1, 2014

* अवतारी पुरुष *

                               अवतारी पुरुष
                                ---------------
               प्रिय भारत देश आदिकाल से ही एक दिव्य एवं महान देश है। इस पवित्र धरा पर दिव्य पुरुष,अवतारी  पुरुष, व महान पुरुषों ने जन्म लिया है। त्रेता युग में श्री राम प्रोसतम पुरुष के अवतार थे,दवापर- युग मे श्रीकृष्ण परम के अवतार थे सतयुग में राजा हरिशचन्द्र धर्म के अवतार थे ओर्   प्रिय ईसा मसीह सुक्षम के अवतार थे ठीक.कलयुग मे भी उसी परम शक्ति ने अवतार धारण कर लिया है।  जब भी किसी महान अनुभुति ने इस धरा पर जन्म लिया है भारत देश में अवश्य पधारे व अपने शुभ  कदम रखें हैं। वर्तमान काल में भी भारत देश मे अपनी सभी दिव्य शक्तियों सहित बहुत सुन्दर रुपं  " मानुशमं रुपं " में अवतार  पर्गट हो चुके हैं।
                  विश्व में समय समय पर अनेक अवतारी पुरुष, महापुरुष , ऋषि, मुनि ,सतं  दिव्य व योगी पुरुष, कारक पुरुष के रुप में इस पवित्र धरा पर हमारे बीच में अवतरित हुए हैं  जैसा कि राजा रिषिभ, गुरु नानक देव, गोतम बुद्ध मोहमद। महापुरुषों पर सभी धर्म जाती का  बराबर का अधिकार मान्य है आज भी संसार में महानपुरुष हैं  जो  अध्यात्म जगत का उन्नत किस्म का अनुभव रखते हैं जो आम पुरुष की तरह हमारे बीच में रह रहें हैं। हम उनको केवल उनके अध्यात्मिक दिव्य अनुभवों को जानकर उनके आधार पर ही उन्हें पहचान पा सकते हैं। हमें उन से अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर,  परमपिता प्रमात्मा की खोज कर उसकी शरण मे जाना चाहिये जो हमारे जीवन का असली उद्देश्य है
           
                                   दास अनुदास रोहतास।