Saturday, September 10, 2022

You are welcomed in Spirituality

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असली राम कौन है जी ?


* Difference between Soul & Mind *


Answer by Rohtas:-                                         

               आदरणीय श्रीमान जी नमस्ते, आत्म तत्व एक अति पवित्र दिव्य तत्व है जो सभी प्राणियों को आंशिक रूप से नित्य प्राप्त है। और मन हमारे भौतिक शरीर रूपी सृष्टि के प्राकृतिक तत्वों के प्रभावित गुणों, काम क्रोध लोभ मोह अहंभाव एवं मन बुद्धि ज्ञान और क्रमेन्द्रियो के स्वभाविक प्रेरित गुण सुगन्ध, स्पर्श, दुख, सुख, स्वाद रस इन सबसे जो प्रभावित जिवात्मा रूपी अहसास का अस्तित्त्व महसूस होता है वह हमारा मन है। आत्म तत्व मन में है मन आत्म तत्व मे नहीं। आत्म तत्व अति पवित्र दिव्य immortal तत्व है, Stable है, जिसे आप अन्तर्मुख होकर दिव्य नेत्रो द्वारा in I D U में अनुभव कर सकते है, can realized just like a brilliant Star, Suksham-Atom, सूक्ष्म- अणु के रूप में, जबकि मन को नहीं मन तो बस एकमात्र अनुभाविक केन्द्रीय सूक्ष्मदर्शीय एहसासिक बिन्द है। Mind is changeable and unstable and is a subject of Expirience, influenced by Qualities of our sense organs and senses.



अर्थात * मन इस शरीर रूपी सुन्दर सृष्टि की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानिन्द्रियों के गुणों से प्रभावित उत्पन्न मात्र भाव है, जो केवल अनुभव का विषय है * अस्थिर बन्दन से बना जीवात्मा से सम्बन्धित है, सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित है, जिसका कोई अपना स्थाई अस्तित्व नहीं, " जबकि आत्म-तत्व एक अति पवित्र दिव्य तत्व है, स्थिर, स्थाई अस्तित्तव है, अमर है, अजर है, Immortal है प्रभू कृपा होने पर दिव्य दृष्टि से भृकुटि के मध्य, व्यक्तिगत दिव्य I D U में अवलोकन किया जा सकता है। भले ही अनुभव से दोनों आपस में गहरे सम्बन्धित हैं, दोनों एक लगते हैं, वास्तव में देखा जाय, अध्यात्मिक दृष्टि से एक नहीं हो सकते, दोनो में काफी अन्तर है।


श्रीमान जी नमस्ते 👏

              " आत्मा सो परमात्मा " आत्मा हो या आत्मा का अंश हो जी, है तो आत्म तत्व ही। अध्यात्मिकत्ता से समझने के लिये हमें शुरु से सृष्टि की रचना को लेना पडेगा । संक्षिप्त में अध्यात्मिक दृष्टि से सृष्टि की रचना, प्रकृति + पुरुष अर्थात आत्म तत्व + प्रकृति के मेन पांच तत्व- भूमि, आकाश, जल, वायु, अग्नि, आदि से है आत्म तत्व अति पवित्र तत्व है जो हर प्राणी को जीव को चाहे थल चर है, जल चर है या नभ चर है, नित्य प्राप्त है। इनमें जो आत्म तत्व है अति पवित्र, अमर , अजर , अमिट, immortal है जबकि changing is the law of Nature के कारणवश प्रकृति के सभि पांच तत्व और उनसे समबन्धित प्रभावित गुण, दोष- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मन, बुद्धी और ज्ञान, दु:ख, सुख, स्वाद्, रस, स्पर्ष ये सब प्रभावित दोष, परिवर्तनशील हैं इनका प्रभाव भी आत्म तत्व पर बदलता रहता है इसके इलावा * कर्मगति टरे ना टारे कर्मों की गति न्यारी जी * हम अपने जीवनकाल में जो कार्य करते हैं सात्विक, धार्मिक व उनके कर्मफल अनुसार भी हमारी आत्मा (जीवात्मा ) प्रभावित होती रहती है। जैसे वातावरण साफ होने पर भी मौसम बदलता रहता है।

१. काली घटा हफतों तक रहने पर भी साफ हो जाती है।२.  गर्मी के मौसम के बाद शर्दी ३. वायु में बावरोला कभी तुफान है तो कभी शांत ४. पृथ्वि पर कभी भूकम्प, कभी ज्वालामुखी फटना तो कभी शान्त है। 5. आसमान में भी समय-समय पर globing warming होता रहता है और फिर शान्ति स्थापित हो जाती है। इस प्रकार सृष्टि में सृष्टि की सृष्टियों में प्रकृतिक प्रभावित बदलाव होते रहते हैं जिनके गुण दोष के बन्धन में आत्म तत्व बन्धकर प्रभावित होता रहता है और समय आने पर भग्ति द्वारा प्रभू कृपा होने पर जीवात्मा विकार मुक्त भी हो जाता है और फिर आंशिक तत्व परम तत्व से योग कर लेता है।

             भटकने वाली कोई ऐसी बात नहीं यह सृष्टि चक्र प्रभू कृपा से आदि अंत और मध्य, यूं ही चलता आ रहा है, चल रहा है और चलता रहेगा। प्रभू कृपा पाकर हमें यह अनमोल अध्यात्मिक जीवन मिला। इसमे गहरी भग्ति करते हुए विकारमुक्त हो, अपने आत्म तत्व रूपी जिवात्मा को पवित्र कर, भगवान के श्री चर्णों मे नतमस्तक हो उनकी शर्ण में जा, उनको पूर्ण समर्पित होते हुए, उनसे योग कर, अपने आप को धन्य बनाना चाहिये।
     धन्यवाद सहित
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Global Warming divine Realization during meditation in Universe

1 Asteroid is moving very fast downward
2 Some planets gathered in one place
3 Spirits are visible in some Subtle Body          in Divine-Kohra
4  Some Soldiers are seen duly standing in      the Queue
 

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      * Precaution *


At first, self realization of Soul-Tatav is very compulsory, then is out of Shortcomings.

                       Das Anudas Rohtas

Thursday, September 1, 2022

Difference Between Physical World and Spiritual Divine World

Difference between Physical World and Spiritual Divine World 


परम स्नेही भग्त जनों सादर प्रणाम्

                  सबसे पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं, हे मालिक, आप हम सब पर अपनी मेहरे नजर बनाय रखना। क्योंकि आपकी कृपा के बिना तो इस सुन्दर सृष्टि और सृष्टि की सृष्टियों में, पत्ता भी नही हिलता। आप आशिंक तत्व के रूप में, सब प्राणियों के हृदय रूपी मन्दिर में नित्य प्राप्त हैं। इसलिये कुछ भी पाने व जानने को शेष नहीं है, बस आप को अनुभव में लाना है। इस लिये आओ हम सब परम भग्त, प्रभू कृपा पाते हुए, व्यक्तिगत अनुभव द्वारा, सृष्टि में, अपने इस अद्धभुत्त दिव्य, सुन्दर संसार में, पहले अपने आप को जानने का प्रयास करते हैं। जब तक हम अपने आपको नहीं जानेंगे, हम भगवान की दिव्य सत्ता के बारे में, दिव्य  आलौकिक व परलौकिक ज्ञान के बारे में व परम ज्ञान के बारे में कैसे अनुभव कर सकते हैं। इसके लिये हमको सबसे पहले जबसे सृष्टि बनी तबसे लेकर आज तक, समस्त भौतिकी ज्ञान व आदि दिव्य अध्यात्मिक अनुभवों को संज्ञान में लेना होगा। It's the matter of self-realization yet, No one can show his divine expiriences to anothers.

               भारतीय इतिहास में ऐसा कोई समय नहीं रहा, जब अध्यात्मिक दिव्य परम-योग-ज्ञान का बोल बाला न रहा हो। दवापर युग में महाभारत के समय, प्रारम्भ में भगवान श्री कृष्णा ने, धनुर्धारी अर्जुन को, उपदेश देते हुए कहा था, हे अर्जुन, सबसे पहले यह Divine Immortal अविनाशी दिव्य योग ब्रह्म ज्ञान, श्रीमद्भागवत गीता में दिये गये His Sweet song के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में मैने, सूर्य को दिया, सूर्य ने मनू को दिया, एवं मनू ने ईश्वाकू को दिया और ईश्वाकू ने राजा रघू को दिया और रघू ने राजा श्री राम को दिया ! तभी से ले कर आज तक, यह रघु कुल रीत सदा चली आई, प्राण जाएं पर वचन न जाईं , यह रीत यूं ही चली आ रही है। सत्तयुग में राजा श्री सत्तवर्त महापरम ज्ञानी हुए, परम योगी हुए, जिन्होंने सत्तयुग में अपने जीवन में बहुत गहन तपस्या की जिससे उनके पुर्वजों की आत्माऐं पुन: भूलोक में इस पवित्र धरा पर इस मृत्युलोक में दिव्य महा शक्ति तुरिया योग क्रिया के माध्यम से, अपने दिव्य सूक्ष्म शरीर से, अवतरित होना शुरू हो गयी थीं। और उसी क्षण भगवान को प्रकट होना पडा। ऐसे दिव्य महात्त्मन योगी अनुभवी महापुरुष अब भी खोजने से हमारेेे प्रिय:  भारत देश मेंं मिल सकते हैं जिन्हें Divine Maha Shakti Turiya Yog Activation का अनुभव हो सकता है। प्रभू कृपा से, लगता है महा शक्ति दिव्य योग "तुरियाा-क्रिया" का कुछ अनुभव हमें भी since 1990 से हो सकता है।



                   सत्यवादी धर्मावतार राजा श्री हरिश्चन्द्र जी ब्रह्मज्ञानी हुए, उनके सत्य के प्रताप से ऋषि विष्वा - मित्र जी प्रकट हुए, राजा ऋषिभ परम योगी हुए, और त्रेता में राजा जनक ब्रह्म ज्ञानी हुए, इतना ही नहीं राजा जनक Metamorphosis दिव्य ज्ञान योग क्रिया का विशेष अनुभव भी रखते थे। सुना है त्रेता में जिनका एक दिव्य, ब्रह्मज्ञानी, योगिनी सुलभा नाम की विदूषी से काफी लम्बे समय तक भौतिकी और अध्यात्मिक विषय में आपसी समन्वय को लेकर और पर-काया-पलट के ऊपर आपसी वार्ता लाप भी हुआ था। उसी समय में ऋषि अष्टा वक्र जी ब्र्रह्मज्ञानी हुए। दवापर में वेदव्यास जी परमज्ञानी हुए जो Physical world में Global Realization का knowledge भी रखते थे। और अब कलयुग में तो घर घर में ब्रह्मज्ञानी व परमज्ञानी पुरुष देखने को मिल जाऐंगे, क्योंकि यह मशीन का युग है, जो हर घर में Computer और Mobile के रूप में नकल करने के लिये आसानी से उपलब्द है।



                     यहां पर व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर भौतिक व अध्यात्मिक दिव्य रूहानी Discussion हो रहा है अब हम अपने ध्येय विषय की ओर बडते हैं। आज का हमारा ध्येय विषय है भौतिक जगत व अध्यात्मिक दिव्य जगत में क्या अंतर है। जहां भौतिक जगत के क्षेत्र में हमारे Scientists नें Physical World में हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त की है, वही अध्यात्मिक जगत में भी हमारे बुद्धिजीवी अध्यात्मिक दिव्य योगी महापुरुष पीछे नहीं रहे, और दिव्य जगत में आज भी हमारे प्रिय: दिव्य एवं ऐतिहासिक देश, भारत देश में, आदि दिव्य योग शक्ति का अनुभव रखने वाले अन्तर्मुखी, दिव्य, स्थिरप्रज्ञ योगी महा पुरुष, अवतारी पुरष, Evanescent "क्षणभंगुर" महात्त्मन, मिल सकते हैं।


 Greatness in a Divine Yogi Purush and  Avtari Purush:-

              A gentleman divine yogi purush takes His breath in India awhile and leaves the same breath in the next moment in America and if he takes his breath in America, he leaves the same breath next moment in India, during meditation realization in Evanescent-Yog-Activation Divinely. 

               A True Devotee of God living in this beautiful Shristi completes the Spiritual Journey of the Holy Soul in his life and enjoy the both kind of outer World's and Inner divine World's situation by divine activations and expressing the ultimate bliss.

                    * जेडा ब्रह्मंडे सो ही पिंडे *
आदि सच, जुगाद् सच, नानक होषी भी सच, है भी सच 
           

                        आदरणीय परम स्नेही भग्त जनो सभी सृष्टियों में यह अति पवित्र आत्म तत्व, Atom, अणू, चाहे भौतिक स्थूल सृष्टि है चाहे अध्यात्मिक सुक्ष्म दिव्य सृष्टि है, यह दोनों अवस्थाऒं में यूं ही चमकता है जो सब सृष्टियों को नित्य प्राप्त है। जिस प्रकार अध्यात्मिक दृष्टि से हिन्दू-ईजम में श्री राधा कृष्णा को अलग नहीं कर सकते, क्योंकि यह दोनों दिव्य शक्तियाँ एक ही माया के दो रूप हैं Supreme Tatav + Divinity (Divine Power Ring). इसी प्रकार भौतिकता व अध्यात्मिकता को भी हम अलग नहीं कर सकते, क्योकि अध्यात्मिकता - भौतिकता का ही आनुभविक, मनोविज्ञान और भावनात्मक दिव्य विशेष गुण है। लेकिन भौतिकता अध्यात्मिकता का अनुभाविक दिव्य गुण नहीं है प्रमाणित फल है। अध्यात्मिकता दिव्य आत्म तत्व भौतिक संसार में रहते हुए सक्रियात्मक है। जैसे सूर्य और सूर्य की प्रकाशमय किर्णें अलग नहीं हो सकती, बल्कि सूर्य है तो किरणें हैं। इसी प्रकार भौतिक जगत और अध्यात्मिक दिव्य जगत इन दोनो शक्तियों का आपस में विशेष घनिष्ट सम्बन्ध है जहां अति पवित्र परम आत्म तत्व निवास करता है और हम भी व्यक्तिगत अनुभव को मध्य नजर रखते हुए आप सबके सहयोग से इन दिव्य प्रक्रियाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास करते हैं


ध्यान रहे:-

       * पुरुष प्रकृति में है, प्रकृति पुरुष में नहीं *

                           * सृष्टि *
                भौतिकी.....+..... आत्म तत्व
                प्रकृति.......+.......पुरुष, आत्मा
                जड..........+.......चेत्तन तत्व

       According to Hinduism, अध्यात्त्मिक दृष्टि से पुरुष शब्द से अभिप्राय: आत्म तत्व से है! सृष्टि परस्पर दोनो शक्तियों पुरुष व प्रकृति के सहयोग से बनी है।

                 अब यह तो विज्ञान का विषय है इसके बारे में या तो वैज्ञानिक ही सुझाव दे सकते हैं क्योंकि विष्व भर में Because Scientists are searching about the creation of this beautiful Shristi. या फिर कोई अध्यात्मिक परम ज्ञानी दिव्य महापुरुष, योगी पुरुष, जिस पर परम पिता प्रमात्मा की विशेष कृपा हुई हो और जिसे सृष्टि में सृष्टियों के दिव्य अनुभव प्राप्त हो, इस विषय के बारे में बता सकता है। अध्यात्मिक दृष्टि से सृष्टि में पुरुष व प्रकृति का गहरा सम्बन्ध है इसी प्रकार का प्रशन्न, कुछ समय पहले फेस बुक पर आया था, जो निम्नलिखित है!
विशेष:----

    भौतिकी, अध्यात्मिकता में नहीं है,
    अध्यात्मिकता भौतिकी से है।
    भौतिकी है तो आध्यात्मिकता का अनुभव है!
    भगवान हैं तो भग्त है ......
    भग्त द्वारा ही तो भगवान का अनुभव है!
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Face - Book

प्रश्न पूछें *** उत्तर पाएं *** शंका *** समाधान ***
Question by :--- Mahi Singh 

सभी विद्वानों को सादर प्रणाम्
सभी से एक प्रश्न है
सभी जानते है कि भगवान एक ही है और नाम अलग अलग ओर सभी मे भगवान वास करते है
ये सब जानते हुए भी सब लोग आपस मे बहस क्यों करते है क्यों झगड़ते है क्यों एक दूसरे को नीचा देखाने की होड़ लगी है सभी इंसान हैं भगवान को मानने वाले है तो सभी क्यों एक दूसरे के दुश्मन बने बैठे हैं क्यों नही हर किसी मे भगवान को देख कर उसके साथ अच्छा वयवहार करते,
क्यों क्यों ? ?

Answer by Rohtas:----


                     मालिक की कृपा अनुसार प्रेरणा पाकर संक्षिप्त में हम उत्तर लिखने का प्रयास करते हैं। भगवान ने बडे  विधी-विधान, नियम व नियति अनुसार इस सुन्दर सृष्टि में शरीर रूपी सभी सृष्टियों की रचना पुरुष एवं प्रकृति के मेल से की है। अध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा को यहां पुरुष शब्द से सम्भोदित किया गया है। जो हमारे प्राकृतिक शरीर में हृदय मे वास करती है और हमारे दिव्य सुक्ष्म शरीर जो प्राकृतिक गुणों के बन्धन से बना है को यहां प्रकृति के नाम से जाना गया है कृपया यहां ध्यान देने की आवश्यकता है Because " Changing is the law of Nature " जिसकी वजह से प्रकृतियों के तत्वों व गुणों में बदलाव होने से यहां सब सृष्टियों की मनोवृतियां, स्वभाव, nature, सत्वगुण, रजोगुण, व तमो गुणो के प्रभाव की वजह से और प्रकृति के पांचों तत्वों व उनकी कर्मेन्द्रियां और ज्ञानिन्द्रियों के गुणों से प्रभावित होती रहती है जिनका हमारे मन से घनिष्ट सम्बन्ध होता है मन का स्वभाव बडा चंचल है जिनकी वजह से ये सब सूक्ष्म सृष्टियां (प्राणी, जीव) आदि भिन्न भिन्न स्वभाव वाली अनुभव में नजर आती है और आपसी विचारों में समन्वय नहीं बन पाता। लेकिन परम आत्म तत्व सब में एक समान है Holy Soul अति पवित्र है, Immortal है, जो विकार मुक्त (गुणातीत) होने पर भी सदा, आदि, अंत और मध्य तीनों अवस्थाओं मे एक जैसा समान, स्थिर, पवित्र बना रहता है। अत: सभी सुक्ष्म सृष्टियां स्वभाव से भिन्न भिन्न होने पर भी विकार मुक्त होने से, आर्य, सात्विकता व सनातनी गुण का प्रभाव बडने पर आपसी समन्वय हो जाता है। आत्म तत्व सब मे समान है, तात्विकत्ता से सभी  भग्वत् प्रायण हैं, भगवान स्वरूप हैं यह अध्यात्मिक गुह्य ज्ञान है।         


                श्री मद्भाग्वद्गिता के अध्ययन 4, श्लोका 7-8 में दिये गये अपने कथन अनुसार लोर्ड श्री कृष्णा वर्तमान युग कलयुग में अपने दिव्य, अविनाशी, योग मायावी, मोहिनी, दिव्य स्वरूप नारायणी देह से साक्षात् साकार रूप "मानुषम् रूपं" जो भगवान का दिव्य, अति प्रिय: सुन्दर रूप होता है, में, इस पवित्र दिव्य धरा पर इस अद्धभुत्त् सुन्दर संसार में, प्रिय: दिव्य देश, भारत देश में, हम सबके बीच में प्रकट हो चुके हैं। Lord Shree Krishna has become Reincarnated and Appeared in India. भगवान अपने लग्नेषू, जिज्ञाषू, परम भग्त पर अपनी विशेष कृपा कर, अपना कृपा पात्र चुन, उसे सृष्टि में दिव्य लीला अवलोकन करा सकते हैं, कि इस दिव्य सुन्दर सृष्टि की उत्पत्ति व रचना कैसे हुई। हमारे दिव्य पुरुषों, योगी पुरुषों व अवतारी पुरुषों ने समय समय पर अपने अपने व्यक्तिगत भौतिक व अध्यात्मिक दिव् अनुभव इस सुन्दर सृष्टि में हम सबकी भलाई के लिये छोडे हैं, जो शास्त्रों में आज भी वर्णित हैं, एतिहास ग्वाह है। इसी प्रकार के कुछ दिव्य अनुभव हम भी Share करने का प्रयास करना चाहेंगे, जो व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर हैं। भौतिक संसार में आंखे खुली रहने पर, हम सब कुछ साक्षात्कार, प्रतक्ष रूप में अनुभव कर सकते हैं आंखे बन्द होने पर नही। और अध्यात्मिक संसार में हम आंखे बन्द करके एकाग्र मन होने पर अन्तर्मुखी होते हुए स्थिर प्रज्ञ होकर in internal divine universes में हम दिव्य अनुभूतियाँ अवलोकन कर सकते हैं, आंखें खुली रहने पर नहीं। भौतिक जगत में प्रत्यक्ष प्रमाणित फल में एक सीमाबद्ध ज्ञान क्षेत्र में कार्यरत रहते हुए विश्वास किया जाता है जबकि अध्यात्तम में outer world and inner divine world के अनुभवात्मिक दिव्य गुणों पर विश्वास किया जाता है। गहराई से शोध अनुसार भौतिकीय विज्ञान और अध्यात्मिक ज्ञान दोनों पारस्परिक हर क्षेत्र में एक दूसरे के साथ साथ पूरक सम्बन्धित होते हैं।


     Now Difference between Physical &              Spiritual Divine World

1 Physical World:-
               
                भौतिकी क्षेत्र में हम समस्त ब्रह्मंड में समस्त लोकों में सभी ग्रह, उपग्रह इनमें सभी प्रकार के प्रकृति के रसायनिक तत्व व भौतिक तत्व, इनकी उर्जाएं, सभी प्रकार की सामग्रियों, गैसज व उनकी की उर्जा एवं Gravity powers & Cosmic Waves जो भी हैं हम अपने भौतिकी शरीर की कर्मिन्दिर्यों और ज्ञानिन्द्रियों के Active गुण व प्रमाणित फल जो हम भौतिक आंखों से सकारात्मक प्रभाव अवलोकन करते हैं इन विषयों पर अध्ययन करते हैं और इनके गुण व दोषों पर विचार करना खोज करना भौतिकी विषय है। physical world में हम भौतिक पद्धार्थों धन दौलत प्रोपरटी शरीरिक सम्बन्दों ऐश्वर्य व लोकिक बाह्य जगत की सामग्री व इनके गुणों को महत्त्व देते हैं। But It's short time pleasure.  हमारे sciencetists दिन रात सभी भौतिकीय क्षेत्रों में जब से सृष्टि बनी आज तक गहराई से Searching करते हुए बहुत प्रयास करते आ रहे हैं। इस पवित्र धरा पर, इस अद्धभुत्त संसार में जो कुछ भी नजर आ रहा है सब प्रभू कृपा है, प्रकृति है और प्रकृति की ही देन है। लेकिन Changing is the Law of Nature इस लिये प्रकृति के सभी पदार्थों में स्वभाविकली बदलाव होता रहता है। So, Nature is Mortal.

2  Spiritual Divine World:-

                   अध्यात्मिकता का अर्थ है आत्म तत्व व तत्व की दिव्यत्ता, Divinity पर विश्वास करना और हमारे सूक्ष्म शरीर के आन्तरिक, अध्यात्मिक, सात्विक, दिव्य अनुभवों पर अध्ययन करना अवलोकन करना होता है। प्रभू कृपा अनुसार आत्म तत्व से अभिप्राय: एक Holy Soul अति पवित्र आत्म तत्व से है जो हर जीव प्राणी थलचर, जलचर, व नभचर, सभी को नित्य प्राप्त है जिसका सबके हृदय में वाष है, यह अजर है, अमर है, अमिट है, Immortal है। जबसे सृष्टि बनी हमारे बुद्धजीवी महापुरुष दिव्य योगी पुरुष अवतारी पुरुष आत्मिक ज्ञान जिसे ब्रह्मज्ञान व परम ज्ञान भी कहते हैं पर अध्यात्मिकता से शोध व बोध करते आ रहे है और अपने अपने दिव्य अनुभव छोडते आ रहे हैं। आध्यात्मिकता में आंखें बन्द करके अन्तर्मुख होते हुए, गहरे ध्यान योग द्वारा भृकुटि के मध्य स्थित दिव्य ब्रह्मांड में एकाग्रमन के होते हुए, स्थिरप्रज्ञ होने पर, आन्तरिक दिव्य ब्रह्मंड में in Internal Divine Universe में जाकर Turiya Yog क्रिया की सहायता से, बेतर्णी के सहारे, भव-सागर को पर कर, Supreme Atom, Tatav से योग कर, अध्यात्मिक ज्ञान जगत के दिव्य लोकों, परलोकों, सृष्टि चक्र आदि, दिव्य अध्यात्मिक अनुभूतियाँ का अनुभव व अवलोकन करना होता है। जिसे हमारे ऋषि, मुनिजन, दिव्य योगी पुरुष सदियों से करते आ रहे हैं। आज भी ऐसे महान दिव्य योगी पुरुष हमारे दिव्य देश, प्रिय: भारत देश में खोजने से अवश्य मिल जाएंगे।


              Physical world, भौतिकी क्षेत्र में हम भौतिक जन साधनों के माध्यम से प्रेक्षपात्र आदि की सहायता से एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर जाना खोज करना आदि ये सब होता है और Spiritual world में हम अध्यात्मिक दिव्य जन साधनो द्वारा हमारे सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर व आन्तरिक आत्मा तत्व द्वारा, अन्तर्मुखी होते हुए, ब्रह्मज्ञान और दिव्य क्रियाओं की सहायता से अपने Inner divine world में जाकर एहलोक व परलोक में परलौकिक व आलौकिक ज्ञान प्राप्त कर अपनी जीवन की Soul Journey को पूरा करते हैं। इस प्रकार भौतिक संसार और अध्यात्मिक संसार दोनों में स्वभाविकली गहरा सम्बन्ध है। अगर गहराई से मिलान करें तो हम इनको अलग नही कर सकते। There is no difference between them, और आपस में दोनों का घनिष्ट सम्बन्ध है। वास्तव में देखा जाए तो यह सब भगवान की माया है    


  In fact it's an automatically, systematically, divine and Illusionary creation of The Almighty God.

Difference :---

       Nature is Mortal & Changeable
       Soul Tatav is Immortal, Holy & Stable

1.            भौतिक विज्ञान में इस ब्रह्मांड में हम अपनी खुली आंखो‌‌‌ से प्रत्यक्ष रूप में जो भी सामाग्री है जैसा कि उर्जा Gravity power सूर्य चन्द्रमा तारे व सन्य सभी प्रकार की Natural Elements जो भी हम आसमान में अवलोकन करते हैं उनपर शोध करने और खोज करने और साक्षात्कार करने का प्रयास करते हैं यह सब physical world's की अनुभूतियाँ हैं।

2.             अध्यात्मिक ज्ञान से अभिप्राय: आत्म तत्व पर अध्ययन व अनुभव करना है। भौतिक आंखे बन्द करके अन्तर्मुख होते हुए, भग्तिमय दिव्य सूक्ष्म शरीर द्वारा, एकाग्र मन होते हुए, मन की गहराई में जा कर, स्थिरप्रज्ञ होते हुए अन्तर्मुखी होकर, मन की दिव्य आंखों से inner divine World में भी हम सूक्ष्म तौर से, दिव्य सूर्य, चांद, तारे, Galaxy's, आकास गंगाएं and colourful divine lights आदि का अनुभव कर सकते हैं। आत्म तत्व के पवित्र होने पर ही दिव्य अनुभूतियाँ हो सकती हैं।




           We realized Shristi Chakra moving in the inner divine universe just like a Potter's Wheel, during meditation on its axis, at 3-00 am, on 3-9-22

                 There is great relationship between physical world and spiritual world. Similarly there is deep relationship  between a true Devotee of God and GOD. One Scientist can have both Physical and Spiritual knowledge, similarly, A Spiritual divine person also may be realized both Physical and spiritual Divine knowledge physically, and scientifically during meditation in I D U

                 प्रभू कृपा अनुसार संक्षिप्त रूप से हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में physically, Spiritually, Divinely & all Spiritual Divine Experiences जो भी अनुभव हुए  Theorically Jeomatrically, Practically and Video-graphycally सबको सूक्ष्म तौर से हमने, अपने सुलेखों में संक्षिप्त रूप से दर्शाने का प्रयास किया हुआ है। आप भी इन दिव्य अनुभवों का अनुशर्ण कर अपने जीवन में दिव्य अध्यात्मिक आनन्द प्राप्त कर अपना जीवन धन्य बना सकते हैं।

     * जय श्री कृष्णा  जय श्री राम *

             * ॐ जय सच्चिद्धानन्द जी *
           
                       दास अनुदास रोहतास
          
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                                🙏 🙏
                             🙏 🙏 🙏