Monday, May 25, 2015

BIGINING OF THE SHRISTI

                    Bigining of the Shristi
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             After Mahaparlaya (SUNYA), there happened a " GREAT-BLAST " in Blue-Hole, then automaticuly and systematically appeared first of all Divine- Supreme- Tatav (Like Brilient Star) and it stable and all Natural Elements in Universe. After millions of years begiing of the Shristi, The End may be happened same. Like this, it will be happened continuously and automaticuly again and again, many time in Shristi to be appeared, (begining) and End, of the Shristi, Naturly. A self realization in meditation.

     " End may be the Same "

                       Universal Truth



                                Das Anudas Rohtas

Monday, May 11, 2015

" योगी " * धारणा-ध्यान-समाधी * कुन्डलिनी शक्ति जागरण - पर- कायापलटग

                           " Y O G I "
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         कुन्डलिनी शक्ति जाग्रित - सहज योग दर्शन
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                अध्यात्मिक दृष्टि से कुन्डलिनी शक्ति जाग्रित योग का अभिप्राय है सहज-योग दू्ारा कुन्डलिनी का जाग्रित होना । समझने में, पढने में, बोलने में और सुनने में बहुत आसान लगता है । लेकिन वास्तव में इतना सहज, इतना आसान नहीं है । दू्ापरयुग में एक प्रसिद्ध श्रेष्ठ मुनि के कथनानुसार --" बहुत कठिन है ढगर पन-घट की "। अर्थात कुन्डलिनी शक्ति जाग्रित करना  बहुत कठिन है फिर भी, भगवान जिस प्राणी पर कृपा करतें हैं उसके लिये तो कोई भी विषय मुस्किल नहीं है। युग युगान्तर से विश्व में विशेषकर हमारे प्रिय: भारत देश में, ऋषि, मुनि, योगी, संत, देवता, कुन्डलिनी शक्ति के ऊपर शोध करते आ रहे हैं " ऊमां कहूं मैं अनुभव अपना, सत्य हरी नाम जगत सब सप्ना ", और वर्तमान युग में भी लगे हुए हैं कोई योग आसन क्रियाओं दू्ारा, कोई जप, तप, ध्यान, योग दू्ारा, कोई नाम योग दू्ारा , "कलयुग केवल नाम अधारा सिमर सिमर नर उतरीं पारा"। नाम योग + ध्यानयोग, सर्व-श्रेष्ट योग है। स्वामी सत्यानन्द जी ने भी लिखा है," राम नाम आसन बिना, आसन नट की खेल,  व्यर्थ नशें निचोडना, धड की धक्कम पेल ! " अर्थात " राम नाम " सबसे ऊंचा है। राम नाम से तात्पर्यप परमपिता प्रमात्मा के लिये जो भी उचित शब्द सिमरन के लिये चुना गया हो (अपने अपने धर्म, समुदायों, संस्थापकों के अपने अपने नाम (शब्द) हैं। जैसा कि औंम, राम, अल्लाह, वाहेगुरु, God आदि। ये सब विशेष शब्द हैं जो एतिहासिक तौर पर सिद्द हो चुके हैं । भग्ति मार्ग में नाम की महिमां का विशेष महत्व है नाम एक अनमोल साधन है जिसके दू्ारा भगवत् प्राप्ती सहज है। नाम योग ही सहज योग है फिर भी हर योग में ध्यान योग का Meditation का विशेष महत्व है। ध्यान योग के बिना सभी योग अधूरे हैं। धारणा ध्यान समाधि इनके बारे में जानना भी अति आवश्यक है जो नीचे की तालिका में दिया गया है।  यहां पर हम समस्त परम भग्तजनों को ध्यान के बारे एक विशेष सुझाव रखना चाहते हैं !

   ध्यान :--



    विशेष:----
                      कोई भी दिव्य योग भगवान की कृपा के बिना सफल नहीं हो सकता। भगवान की कृपा का पात्र बनना अति आवश्यक है। यदि परम पिता प्रमात्मा की कृपा हो जाए और भगवान लग्नेषू परम भग्त को अपना कृपा-पात्र स्वीकार करले, तो उसके लिये कुन्डलिनी तो क्या उसे सभी दिव्य शक्तियां और दिव्य गुणो का अनुभव प्राप्त हो जाता है। ध्यान रहे भगवान केवल अपने परम भग्त, परम लग्नेषू व जिग्याषू पर ही यह विशेष कृपा करते हैं भगवान अन्तर्यामी हैं, वो बडे दयालु हैं और बडे कृपालु भी हैं। कुन्डलिनी बोध में भी भगवनान की कृपा- पात्रता का होना अति आवश्यक है।

                          कुन्डलिनी जाग्रित योग का अर्थ
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               कुन्डलिनी जाग्रित योग का अर्थ है योग दू्ारा कुन्डलिनी को जगाना। पहले हम कुन्डलिनी का अर्थ यहां जान लेते हैं। कुन्डल+इनी, "रिगं + इनी,"  Outer Power + Inner Power, " RING + TATAV " (आन्तरिक शक्ति) अर्थात गोलाकार के मध्य में सूक्षम बिन्द Dot -Tatav के रूप में स्थित दिव्य शक्ति।  सूक्षम तौर पर हमारे शरीर के निचले भाग में गुदा से ऊपर और रीड की हड्डी Spine का निचला सिरा जहां मिलते हैं के मध्य, वहां सूक्षम रूप में एक दिव्य शक्ति as a Ring, गोलाकार में स्थित रहती है और इसी के मध्य सूक्षम बिन्द के रूप में परम शक्ति विद्धमान रहती है, उसे ही कुन्डलिनी कहते हैं। यही शक्ति हमारे जीवन का आधार है। यहां शक्ति को जगाना तो हम नहीं कह सकते, यह तो पूर्ण दिव्य है, आदि शक्ति है, अमर है, अजर है, Immortle है, भगवान की माया है, हां इसके दिव्य गुणो का भान, दिव्य लीला का अनुभव, दिव्य आनन्द का अनुभव करना कह सकते हैं। बहुत कठिन योगासन क्रियाओं दू्ारा और सहजयोग नामयोग ध्यानयोग दू्ारा विवेक की प्राप्ती होने पर, सत्क्रमों को करते हुए गहरी भग्ति और अछुत्य (निर्लेप) VIRTULESS होते हुए, स्थिरप्रग्य बन, मालिक के चिन्तन में लिप्त हो, मालिक की कृपा का पात्र बनने पर कुन्डलिनी शक्ति का अनुभव हो सकता है। यहां से, VIVEKA -Shakti के दू्ारा शक्ति को " इगला-पिघला, मीन क्रिया दू्ारा खुलने पर नाभी चक्र के मध्य ब्रह्मकमल में, " सुषमना " नाडि (सुन्दर मन के वेग से क्षिरसागर के रास्ते जो ऊपर "षहश्रकमल" तक जाता हे यह Light Made  KOBRA SNAKE , कोबरे सांप की तरह एक दम सीधी खडी हो जाती है और अपने स्थान पर स्थिर Divine - Light दिव्य प्रकाश से बने कोबरे सनेक की तरह दाएं बाएं Swinging, हिलोरे लेती हुई अपने भग्त को आञ्दविभोर करती हुई भिर्कुटी के मध्य ब्रह्मक्षेत्र में आन्तरिक दिव्य ब्रहमांड मे स्थिर हो जाती है। अब गहरे ध्यान योग दू्ारा भगवान के परम भग्त भग्ति करते हुए देव दर्शन कर, भग्वत् दर्शन कर जो नित्य प्राप्त हैं साक्षात होने पर, परम आनन्द को प्राप्त होते हैं। अत: कुन्डलिनी जाग्रत का मतलब है आत्मा को जगाना, आदि शक्ति को जगाना, परम शक्ति को जगाना। जगाने की बात तब करनी चाहिये जब यह शक्ति कभी सोती हो । यह तो Ever activate है ,आत्मा तो अमर है अजर है इसका ना आदि है और न अंत है " भगवन् भूखे भाव के " भगवान तो भाव के भूखे होते हैं जब भाव प्रकट हो जाए (साधक - साधन और साध्य) ये तीनों एक लाइन में सीधे ९० Degree पर स्थित हो जाते हैं जो चित्र में दर्शाया गया हैं : -------

                  *   धारणा+ ध्यान+ समाधी  *
  


              गुणातीत होने पर (Being - Virtueless) शब्द, (साधन, नाम), स्वचलित रूप से छूट जाता है और सीधे ( साधक + साध्य) साधक का परम तत्व Supreme Soul,"SUPREME-TATAV, NIRAKARA" से योग होने पर सब शक्तियां अपने आप सिद्ध हो जाती हैं। जैसा के चित्र में दर्शाया गया है, यही सहज योग है । " जब आत्मा सो जाएगी तो आप ही बताओ क्या होता है (सृष्टि चक्र टूट जाता है जब कि सृष्टि की नियम बद्ध रचना है।) और फिर क्या होता   है, Om Nmaha Shivaye "। इस लिये जगाने की बजाए, अवलोकन करना, अनुभव करना, अनुभव होना उचित शब्द है। अर्थात परम भग्ति, गहरे ध्यानयोग, सहज नाम योग, दू्ारा कुन्डलिनी का बोध कर, अनुभव कर, परमपिता प्रमात्मा के दिव्य शक्तियों का, दिव्य गुणों का और दिव्य लीला को अवलोकन कर सकते हैं ध्यान रहे, ऐसा कभी युग युगाञ्तर के बाद ही हो पाता है, जब किसी परम भग्त पर भगवान की विशेष कृपा होने पर कुन्डलिनी बोध होने और भगवान का साक्षात्कार होने का श्रेय प्राप्त होता है। यहां कुन्डलिनी बोध को व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही निम्न चित्र दू्ारा दर्शाने की कोशिष की गयी है जो गहरे ध्यानयोग द्वारा ही अनूभव हो सकता है :----------
      


                   " कुन्डलिनी शक्ति जागरण योग "
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              प्रिय: भारत देश एक दिव्य देश है । जबसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई तब से लेकर आज तक इस पवित्र धरा पर, हर युग में देवी, देवता, ऋषि, मुनि, संत, योगी पुरुष व अवतारी पुरुष यहां की दिव्य संस्कृति व मर्यादा का रसपान करने हेतू अवतरित होते आये हैं। आज भी इस अद्भुत देव धरा पर महापुरुषों की कोई कमी नहीं है केवल हमारी सूझ से, हमारे अनुभव से, बाहर हो सकते हैं। प्रभू क्रिपा दू्ारा सूक्षम रूप में कुछ अनुभव लिखने जा रहे हैं। कुन्डलिनी शक्ति जागरण, सहज योग आसन क्रिया दू्ारा, बडी आसानी से जगाया जा सकता है पर केवल उसी विशेष सादक पर यह कृपा होती है जो भगवान का विशेष, परम कृपापात्र होता है। क्योकि यह भगवान की दिव्य शक्ति है, और भगवान अन्तर्यामी हैं, भगवान अपने उचित परम कृपापात्र को भलीभान्ती जानते है, और उसी परम भग्त को अपनी पात्रता का कृपापात्र चुनते हैं और उसी परम भग्त को इस पूर्ण विष्व मैं कुन्डलिनी शक्ति जागरण होने, और यह परम सिद्धि प्राप्त होने का सुयश प्राप्त होने का शुभ अवसर प्रदान करते  हैं।

              हम पहले ही कुन्डलिनी शक्ति के बारे में लिख चुके हैं, यह एक Divine Light made Kobra Snake की तरह है जो दो मच्झली के आकार की इग्ला-पिग्ला नाडियों के बीचमें सुरक्षित स्थित हैं जो इनके इरद-गिरद मधानी की तरह left- right- (Spiral) घूमती रहती हैं जिसे हमारे ऋषियों ने मीन क्रिया का नाम दिया है, जब पूर्ण परम योगी भग्त गहरे ध्यानयोग की मुद्रा में प्राकृतिक गुणों से लगाव-रहित (गुणातीत) होकर स्थिर अवस्था में सिद्ध आसन पर बैठ कर अपने लक्ष, " साध्य " पर ध्यान केन्द्रित कर लम्बे समय तक एकांत स्थान पर बैठ प्राथना करता है, ऐसे अपने परम संस्कारी परम योगी परम स्नेही परम भग्त, परम लग्नेषू, परम जिग्याषू को दिव्यता प्राप्त होने पर कुन्डलिनी शक्ति जागरण होने की कृपा प्रदान करते हैं। दिव्य मीन क्रिया दू्ारा इग्ला पिग्ला ऊपर से रासता खोल देती हैं और सुषमना के रासते " पारब्रहम- शक्ति- तुरिया-योग- क्रिया " की सहायता से जो नाभी चक्र से सहस्र कमल को क्रोस करता हुआ क्षिरसागर के बीचों बीच " बेतरनी " को पार कर परम धाम तक ऊपर की ओर जाता है जहां परम ज्योत, परम शक्ति, बेअंत स्वामी विराजमान है, के साथ सीधा योग हो जाता है। यहां  शक्ति जाग्रित होने पर समस्त शरीर प्रकाशमय हो उठता है और करोडों सूर्य कैसा प्रकाश प्रकट हो जाता है क्योंकि यह प्रभ-ज्योत का ही अंश है और गुणातीत होने पर आशिंक ज्योति का परम-ज्योत से अब सीधा योग होने जा रहा है यही परम सिद्धि होती है और कुन्डलिनी शक्ति जाग्रित हो जाती है और VIVEKA-Shakti की प्राप्ती होने पर दिव्य गुण अवतरित होने पर दिव्य अनुभव करता हुआ परम भग्त, दिव्य लीला अवलोकन कर लेता है। और भगवान का " परम- कृपापात्र " कहलाने का गौरव प्राप्त कर लेता है। पूर्ण प्रकाश होने पर, अमृतरसपान होने पर, दिव्य-देव दर्शन होने पर, पूर्ण आनन्द की प्राप्ती होती है जिससे जीवन पूर्ण आञ्दमयी हो जाता है। यही कुन्डलिनी शक्ति जागरण, सहज शक्ति योग - सहज योग है। परम भग्त, कुन्डलिनी शक्ति मां का शुभ आशिर्वाद प्राप्त होने पर, परम दिव्य लीला अवलोकन कर, प्रभू भग्ति करता हुआ, व परम की महिमा का गुणगान करता हुआ, अंत में भव सागर से पार हो जाता है जो एक प्राणी का परम लक्ष है और परम उदे्श्य भी है।

Que:-  By Dryaswantkumar Josy on Facebook on 7-12-17 in अध्यात्तम सागर प्रशन्नोत्तरीं- शंका समाधान-
Answer By Rohtas:-

       * पर काया प्रवेष - काया पलट दिव्य योग क्रिया *
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             * Means," Metamorphosis of a Human Suksham Sariira, Jiwatama, Divinely & Spiritually " *

श्रीमान जी जय श्री राम जी,

                ऐसा प्रशन्न नहीं डाले तो अच्छा है पर  काया पलट सुना तो है। इसमे पूरी दिव्य टीम द्वारा किसी परम भग्त योगी की काया पलट होती है इसमे सभी दिव्य पात्रों की सहायता सेवार्थ से यह कार्य सम्पन्न  होता है भग्ति मार्ग का योगी पुरुषों के लिये यह बहत कठिन व खतर्नाक रास्ता है इसमें सूक्षम शरीर का अन्य सूक्षम शरीर से भगवान अगर उचित समझे तो नियत समय में पर काया पलट हो सकता है कोई विशेष कारण पर ही ऐसा होता होगा, एक दम बाईपास सर्जरी के समान होता है सूक्षम से सूक्षम का कायापन युग में यह तो में भी शायद 6-11-17, at 12-15a m, to 1-15 am के मध्य, पर काया पलट योग क्रिया सम्पन्न हुई हो। सिद्ध पुरुष या परम योगी ही इस विषय के बारे में ज्यादा जानते हैं हमने भी संतों से सुना है बाकी, राम की बातें राम ही जाने।

विशेष:-- महात्मन यहां पर काया पलट का विषय है हमें पहले पर काया- पलट ( प्रवेष ) को समझना होगा ।*** यह तत्व से तत्व की दिव्य योग क्रिया नहीं है जो कारण शरीर की दिव्य योग क्रिया होती है यह क्षणभंगुर होती है, यह थोडे समय में तत्व प्रवेश क्रिया क ई बार अन्य शरीर धारण कर सकता है और तत्व क ई  जगह  प्रवेश कर सकता है आसान है***, पर काया पलट योग very Rare क्रिया है युगयुगान्तर के बाद होती है अध्यात्तम में भग्ति की इस अवस्था को भगवान में पूर्ण समर्पित दिव्य योग अवस्था कहते हैं। इही कायापलट है। यह बहुत कष्ट दायक भी साबित हो सकती है पर मालिक की कृपा रहते सब ठीक रहता रहता है मालिक बडे दयालू हैं कृपालू हैं अपने परम भग्त पर विशेष कृपा करते हैं सदैव उनका आशिर्वाद प्राप्त होता है। जय श्री कृष्णा जी।
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                 " जय श्री कृष्णा - जय श्री राम "


                                       दास अनुदास रोहतास
    

Monday, April 20, 2015

" KUNDALINI AWAKENING YOGA "

" YOGI "
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Kundalini  Awakening Yoga - Sahaj Yog
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                  Sahaj Yoga is very Serveshresth Yoga spiritualy, which has very importance in the life of a true devotee of God. India is a Divine  Country in the world. Many Rishi Munies Divya Purush Yogi Purush and Avtari Purush born here, Kundalini was the importent Attitude of their Lives. As we know by name Sahaj yoga, this kriya is very easy and we can activate it with the help of Igla-Pigla, Meen kriya andwith the help of Sushmana, at the center point of our NABHI-CHACKER.

* Now we show how Kundalini activates in the life of a yogi Purush *
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               First of all we should know that ONLY a Yogi -Purush, Sanskaree - Purush, True Devotee of God, and Kirpa-Paatra blessed by God can be success in activating, in awakening Kundalini Shakti, this special type of Divine - power, "SHAKTI", " Divine-Kriya-Yog " "KUNDALINI" in this World.



               Now we want to explain theorically, how we can  activate KUNDALINI :------

1.         We should be-seated on equal and peralol Place, On Earth, Diwan, Bed, or on a Assan, simpaly, situated with PADAM-ASSAN, SIDH-ASSAN or common, easily, any saral assan as we like comphertaibly to Pray God in Dhyan-yog, "Meditation".

2.        Pray to God with Sadhan (Sabdh) gain from our honourable Guru, also may be left behind for some time in meditation.

3.         Meditation (Dhyan-Yoga) may be unbreaking and continuously.

4.          After some time our breath will move very slowly and smoothly and Sadhan (Sabdh) left behind in back.

5.         After very long prectic and fast determination in continiuous yoga about 10-years, of Yoga Assan kriyas, pranayam, Jap, Tap, Tyagh, prayer, meditation ( Dhyan- Yoga) then God may blessed if He wants.

    " Now question is how we pray or worship of God". 
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               "God is worshipped by deep meditation without any attecment to Natural Virtues being consciousness and with stable mind."

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6.           After many years near about 10-years of Dhyan-yoga, meditation in this methodologically a True Devotee you can find that God may blessed him and first of all you find that there will be happened a great horrible and Vishphoted, Voice of "ANHAD-NADH " only.

7.            We feel a great light coming towards us in streight-line from Heaven to Earth, if we all right in our position and alive. We should not afraid of any divine power or divine scene by observing in meditation here, it is the first stage only of a Devotee and a spiritual test of meditation.

8.            After continuously long prectic in meditation and yoga behinding SABDH we realize KASTH-SIDDHI (a Shidhi Like of Wooden-body) and then after more expirience regularly and continuously meditating, we enjoy AMRIT - RASHPAN, in our spiritual life and realize a very nice spiritual stage of devotion in meditation and great achievement of a true Devotee of God.

9.            Now a devotee can stand in the que of True Dewotee of God and a new kind of divine realization can realize in his Dasam-Dwara in internal divine Universe and a divine Light also in meditation, and now called him as Kripa-Paatra, Param Bhagat.

10.          Now opens Dasam-Dawara here and with long continuous- prectic in meditation after blessing by God, a true devotee can bless with" VIVEKA "a special divine power of God if He wants.

11.         With the help of this divine power, "VIVEKA" a true devotee of God in meditation doing efforts to obtain the destination, the real goal of his life. He can open all Divine Chanal and Chackers and reach to Mooladhara which is real place of Divine power in the Security of IGLA-PIGLA, in the Form of Meen-Kriya and between both of them laying down in the shape of a Ring, as KUNDALINI and stabled in meditation here like a Light Madesnake KOBRA.  Our Rishi-Muni called it Meen-Kriya also. Kundalini awaken after circulating and Monthoning, Left-Right by igla- pigla Meen-kriya and stand with the help of Sushmana Power  here like a " Light-Made- KOBRA" Snake and Swinging (Dance) left and right like Pendulom in oposit-side and push-out him-self towards upper side, crossing all the chanals and chackers and take place in Dasma-Dawara in the Bhirkuti (center place of Forhead) and helps the "JIGYASU "a true devotee of God in realizing the all divine activities of God. 

                     " Meaning of Kundalini "
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                Meaning of word Kundalini
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                          Kundal :-  Ring outer power
                                  ini :-  initial power, Soul.

               We already explain in existence of God that after millions of years in the universe, there happened automaticuly a great Blast in galaxy and then first of all appeared a divine Dot Bindh like Brillient Star, Diamod, and appeared automatically compalitaly a divine Ring 
Round of It, as a Safty- Covach of the Dot, an Historically named as Adhisthan, Adhidave a divine power, a divine soul, and after binding in the Divine-Virtues of Actions of the Natural elements, called Jivatma and after binded in the Human body it called as we know," Kundalini."
               Now it mean we not activating  (awakening) kundalini but infarct we awakening the divine Supreme power or we can say we awakening our divine Supremw soul which laying down and sleaping at the power point of our body," SPINAL CORD "," MOOLADHARA " and It awake up only by Sahaj Kundalini Yoga, because this place is so soft as Rosy-Leaves.

Special:----------- 

                         " Kundalini sleep like a Dot, Sukshum-Bindh and awake like a Light Made Kobra ".



                       After activate Kundalini "Power"-"Shakti", we realize a Lot of divine realizations about God and Godess and daties and Scene of Nature in external and internal divine Universe in BHIRCUTI (a divine place) in the midst of our forhead. Infect we have no words more to explain the great divine realization after awakening Kundalini.

         " Meaning Of Kundalini Awakening "
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                    Now we should come to know that whom we are going to awakening.

1.  Are we going to awakening the Supreme Power, it already ever activated divinely and automaticuly?
2.  Are we awakening our Supreme Soul Tatav it also ever activated?
3.  Are we awakening our , DIVINE-KARAN-SARIRA, situated under our SPINE? Which immortle and ever green.
4.  Are we awakening our Suksham Sarira Divine " RING, ADHISTHAN ", made of Divine Virtues Action of Natural elements, it also ever activated?
           
                 Kundalini awakening means to activate our divine power, " SHAKTI " divine Soul, TATAV, God. It can awaken only blessing by God , when His true devotee, Param- Bhagat, Param- Jigyashu, Param-Lagneshu, is Divinaly and compilitaly ready after clearing all divine Assan yoga kriyas coming in the way of meditation for Kundaini awakening. Only a true Devotee of God can success, only after blessing by Him in AWAKENING-KUNDAINI.

     "GOD HELP THOSE -WHO HELP THEMSELVES"

                    Self confidence, fast determination, Self realization continuously long prectic in meditation, Dhyan-yoga assan kriyas and Stability of mind is very compulsory, in awakening," KUNDALINI ".

                                                  Das Anudas Rohtas

Wednesday, April 15, 2015

" KUNDALINI AWAKENING YOGA BY SAHAJ YOG MEDITATION "

                     *  SERVE  SHRESTH  YOGA *
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                    Sahaj yog kriya, by " PRANAYAM ", Sahaj Nam Yoga and Amrit-Rashpan are Very importent & compalsory in KUNDALINI-BODH, with the help of Igla- Pigla-Meen-Kriya, circulating as a Madhani, round the divine power placed in Mooldhara, with the help of Shusmana and Eagla- Pigla NADI and  TURIYA-Yog-KRIYA (a special Parbraham  divine YOG Kriya) + VIVEKA, by deep Meditation, being consciousness and stability of mind, is Serve-Shresth-Yoga, in the way of Param Bushtits " Param-Anandh ", to awakening and realizing, " Kundalini Shakti " (The Supreme Divine Power) and to be plush (+) with Supreme Soul, God and to reach and observe, Supreme Power, Supreme Tatav, " GOD " is the real goal of our life..

          Spiritual Truth!
                                                       
                                             Das Anudas Rohtas



Tuesday, March 24, 2015

THE GOD

                         God Is God
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         God is God, There can be no any other God. n fact GOD means, Generate Original Divinity, A original divine Power, which appeared automatically after a blast in a galaxy (black-hole) in the bigining of this beautiful Shristi in the universe as Dot a brillient Star like a diamond upper in universe.

                 

                                           Das Anudas Rohtas

Friday, December 26, 2014

* Rohtas Yoga Darshna *

            ROHTASA YOGA DARSHANA


संसकार, अक्षरसाइज, शिक्षा, गुरु, यम, नियम, आसन,
प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधी,
 योगा, मुमुक्षु, मुक्ति, मोक्ष, गुणातीत,
 परमयोग, प्रभू कृपा,
 स्वाधिष्टान चक्र।
परम शान्ति
परमान्दित्त्
🙏

                             Das Anudas Rohtas

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🌼 राजा परिक्षित् 🌼

🙏राजा परिक्षित्-महाकाल प्रभू शनिदेव in कलयुगे:🙏 

      यदा  यदा  हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
      अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
      परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दष्कृताम् ।
      धर्मसंस्थापनार्थाय   सम्भवामि  युगे  युगे ।।

  आदरणीय परम स्नेही भग्त जनों,
👏 सादर प्रणाम् 

                   सभि महापुरुष, दिव्यपुरुष, बुद्धजिवी, महात्मन और योगी पुरुष, आप सब, अध्यात्मिकता अनुसार भली भान्ती अच्छे से परिचित हैं कि 5000 साल पहले महाभारत काल के समय से भी पहले, देवी सत्यवति और ऋषि पाराशर के प्रेम अनुराग से पुत्र ऋषिवर वेद ब्यास जी उत्तपन्न हुए थे, जिनकी कृपा दृष्टि से देवी अम्बे अम्बिके से *राजा धृतराष्ट्र* पाडंव और विधुर के वंशज हुए। आगे चल कर पाडव के पांच पुत्र हुए जिनमें तीसरे नं का कुंती पुत्र धनुर्धारी अर्जुन पैदा हुए। और आगे चल कर अर्जुन का बहादुर पुत्र अभिमन्यु हुए जो महाभारत के समय वीरगति को प्राप्त हुए। और फिर समय रहते ही अभिमन्यु के पुत्र हुए परिक्षित जो एक तेजस्वी राजा हुए जो राजा परिक्षित के नाम से सर्वश्रेष्ठ धर्माचार्य राजा के नाम से विख्यात हुए। बाद में सुना है कलयुग का प्रभाव छाने लगा। महाकाल के रूप में शनिदेव प्रकट हुए और यह राज सिंहासन शनिदेव ने सम्भाल लीया और उस वक्त से कल युग का पहर आरम्भ हो गया। राजा परिक्षित का पुत्र हुआ "जन्मेज्या" और फिर तब से लेकर आज तक
यह जन्म मरण का चक्र यूं ही चला आ रहा है।

* यहां रुहानी discussion हो रहा है अनुभव की पाठशाला में जो पाठ सीखे जाते हैं वह पुस्तकों और विश्वविद्यालयों में नहीं मिलते। *

                  In the divine memories of true devotes of God now we want to repeate some divine Experiences अब हम यहां अपने कुछ अध्यात्मिक दिव्य अनुभव आप सबके बीच में जो अध्यात्मिकता से दिव्य पात्र हैं को, हमें जो दिव्य अनुभव ध्यान अवस्था के दोरान अनुभव हुए, सांझा करना चाहते हैं। जो बिल्कुल स्पस्ट है जो हमें एक बार सतसंग के बीच मे ध्यान में बैठे clearly अनुभव हुए थे। जो दिव्य ताज - पोस महाभारत के बाद राजा परिक्षित ने शनि की महादशा आने से, प्रभू महाकाल शनिदेव को शोंप दिये थे और स्वयं गहन तपस्या करने हेतू भग्ति करने शुक्रताल को चले गये थे। अब वह सभी, काले घोडे की गर्दन कटी हुई, जो स्वर्ण ताज पोषी सेविभुषित थी, और अन्य स्वर्णल आभूषण, स्वर्ण मुकुट आदि हमारे को ध्यान के समय देने लगे, तो हमने कहा, इसकी आवश्यकता नहीं। यह सब प्रभू कृपा के होते, एक दिव्य लीला के वशीभूत हो रहा है। It's divine realization during meditation. Yet it is the matter of self realization and no one can not so to others. Its all depends on the automaticaly systematiculy & diviniely rules of lord god on Holy Earth in this beautiful Shristi. लगता है भगवान ईष्वर अब जहां से दवापर युग में दिव्य लीला छोडी थी तदनुसार वहीं से ही शुरु करना चाहते हैं। लगता है इस अद्धभुत् दिव्य अनुभवी संसार में, दिव्यता यहीं-कहीं पर हम सबमें में से किसी न किसी के पास हो सकती है। और 1990 से दिव्य समय चल रहा है। भगवान ने अवतार धारण किया हुआ है जो विष्व की इस 7-8 अरब आबादी में से कोई भी सुलझा हुआ कोई दिव्य व्यक्तित्व वाला महान,     भद्रपुरुष, ही हो सकता हैं। युग परवर्तन का समय
 हम सबको परम - ईष्वर की भग्ति अवश्य करनी चाहिये। जो मानव का परम धर्म है और मानव होने के नाते हमारा परम उद्देश्य भी है।  

  Secular Spiritual Divine Knowledge

                  रचा है सृष्टि को जिस प्रभू ने वही.......
    
                                दास अनुदास रोहतास