Tuesday, October 31, 2017

WHAT DO YOU MEAN BY AVTARI PURUSH ?

                 * Avtari Purush *

         

 Jai Shree Krishna Ji

Difference Between God, Lord, Human & Avatari Purush.

Avatari purush meaning and differences between five stages in Incarnation of Divine Supreme Power !

1 God :-
                 God then God are all the Divine Automatic Systematic & Divine Immortal creations this formless like a subtle bind those who appear Sveny which sparkled like the diamond. The Amar, Ajar, Immotal and the stable situated on the latitude.

2 Adhi God :-
                  The Formated God is these same Parbrhmin-Prameshwar own rich coordinate himself with his right divine Virtues is these three bodies are one of our finer bodies their physical body Ring. Our Subtle-body they animate body is showing.

3 Lord :-
                   Our body due to them because it is an element of both. Difference is their ultimate reality so our element 3 human macro, Suksm and KARAN. THE SUKSHAM  body are macro is made up of five elements of nature microdissection following work wrath greed fascination ego mind genius and knowledge made that the Bindness properties of five elements,

4 Human Mumukshu :-
                  Embodiment is Bonding eight properties creatures called Jiwatma: - thus after being Virtueless GUNATEET of any creature's body may become four body as Awatari guy because even the fourth body Shree Lord animate in Avatari man's divine elements + The Divine get as Ora, which is a symbol of divinity thus there are four bodies.
5. Avatari Purush:-
                  And Fifth, it is characterized by divine Ring Awatari guy as the fifth divine power VIVEKA on the Lord + Man is, incarnation or Avatari is to get it divinity since not it divine attributes before, and individuals, Avatari guy gets the distinction of being called.

Featuring: ---      

               There is around because the same body that is the ultimate reality is the " KARAN SARIRA ."
                                           Das Anudas Rohtas

अवतारी पुरुष से क्या अभिप्राय है ?

                      * AVTARI PURUSH *

                   

 Jai Shree Krishna Ji

Difference between God, Lord, Human & Avtari Purush .

 अवतारी पुरुष से अभिप्राय है :---
     ---------------------
अवतारी पुरुष से अभिप्राय: और निम्न पांचों अवस्थाओं में अन्तर !

1 God =
               God तो God हैं समस्त दिव्य है Automatic Systematic & Divine Immortal रचना है यह तो निराकार हैं एक सूक्षम बिन्द की तरह हैं जो स्वं प्रकट होते हैं जो diamond की तरह चमकते है। जो अमर हैं अजर हैं और अपने दिव्य अंक्षाश पर स्थित रहते हुए स्थिर हैं।

2 Adhi God =
                   यह प्रारूप भगवान हैं The Formated God हैं इनको पारब्रह्मं प्रमेश्वर खुद अपने जैसा अपना प्रारूप दिव्य गुणाओं से सम्पन्न खुद रचते हैं इनके भी तीन शरीर होते हैं १ हमारा सूक्षम शरीर इनका स्थूल शरीर होता है जो रींग के समान है।  हमारा सूक्षम शरीर है इनका चेतन शरीर है जो दिखाइ नहीं देता। ३ हमारा कारण शरीर इनका कारण वह दोनों का एक जैसा ही तत्व है। फरक इतना है इनका परम तत्व है हमारा आंसिक तत्व है

३ Lord :-
                   यह त्रिगुणी माया का प्रतीक है, सूक्षम, और कारण और चेतन तीनों शरीर दिव्य होते है जो पांच तत्वो के दिव्य  गुणों के बन्दन से बना है, जो निम्न हैं काम क्रोध लोभ मोह अहंकार , मन बुद्धी और ज्ञान अहं भाव, यह जीव को आठ गुणों का बन्दन है जिसे जिवात्मा कहते और जो कारण शरीर आंशिक तत्व है वह सभी जिवात्माओं को नित्य प्राप्त है।

4 Human ( Mumukshu ):- 
                   इस प्रकार जीव के गुणातीत होने पर अवतारी पुरुष के चार शरीर हो जाते हैं क्योकि यहां चौथा शरीर Shree lord का चेतन तत्व के रूप में जो अवतारी पुरुष को दिव्य Ora के रूप में दिव्यता प्राप्त होने पर अनुभव होता है जो दिव्यता का प्रतीक होता है इस प्रकार यहां चार शरीर होते हैं, Mumukshu जो पूर्ण दिव्य है कारण+रिंग-चेतन + सुक्षम शरीर जो प्राकृतिक पांच तत्वों के गुणों के मेल से बना है  शरीर धारण करता है। 
5. Avatar:-
                    पांचवां दिव्य शक्ति Vivek Power के रूप में divine Ring, अधिस्थान, अवतारी पुरुष की विशेषता है यह Lord + Human + Phisical body स्थूल शरीर के मेल से होता है, incarnation, यानी अवतरित होने के बाद ही यह दिव्यता प्राप्त होती है इस से पहले यह दिव्य गुण नहीं होते, और गुणातीत होने पर ही आत्म तत्व का परम आत्मा से योग होने पर, दिव्य गुण अवतरित होने पर, व्यक्ति विशेष होने पर ही, अवतारी पुरुष कहलाने का गौरव प्राप्त हो जाता है।
विशेष:---
  * अत: केवल कारण शरीर जो परम आंसिक आत्म तत्व है जो अति पवित्र है यहां सभी अवस्थाओं में समान रहता है *
संक्षिप्त में:----          
              लेकिन कर्मों अनुसार सभी जीवात्माएं के जन्मों की योनियों में उनके कर्मानुसार परिवर्तन होता रहता है क्योंकि हर जीव के कर्मों का लेखा-जोखा व मोह का बन्धन अपना अपना है जो भोगना पडता है। जिसके अनुसार ही उन्हे अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेना होता है। भगवान का किसी भी जीव के साथ कोई भेदभाव नहीं होता, चींटी से लेकर हाथी तक चाहे जीव किसी भी योनी में है, वह तो निर्लेप हैं। ॐ तत् सत् !
गुह्य पद्ध:----    
            " कर्म गति टरे नहीं टारे कर्मों की गति न्यारी "

                                          दास अनुदास रोहतास

Sunday, October 29, 2017

PARAM HANS ROHTAS

                             Param Hans Rohtas
  

                 When the self-element- soul becomes pure then the master ie the Supreme Spirit, all its divine qualities, all the divine powers partly  for some momentary time, to please their unique ultimate bhakt, to His true devotee to experience their divine LEELA and as the words of the ultimate Swan From the same meaning, "Swan of Param", the Holy soul flies at the speed of the ultimate Swan and takes on the form of the Flow of flame from ges-blower, just like a form of divine Turiya verb, As is happening such values experience so high speed of action of the movement of all the souls of the Holy Spirit. Very great joy is attained and the Dhyan state becomes stable and deep. This Parbrahma - Permeshwer is specially blessed on the ultimate betrayal of the Supreme Father Adam. Such a state of ultimate affectionate Hirda is addressed in the name of Param Hans in Spirituality.

Spiritual truth

                                Das Anudas Rohatas

PARAMHANS ROHTAS

                       * परम हंस रोहतास *
  

    
                    जब आत्म तत्व "आत्मा" पवित्र हो जाती है तो मालिक यानी परम पिता, प्रमात्मा, परम आत्मा अपने सभी दिव्य गुण सभी दिव्य शक्तियां आंशिक रूप से क्षणिक समय के लिये अपने अनन्य परम भग्त को अपनी दिव्य लीला अनुभव कराने हेतू यह कृपा करते हैं और जैसा कि परम हंस शब्दो से ही अभिप्राय है," परम का हंस " अत: आत्मा परम के हंस के रूप में तीव्र गति से उडती है और विष्व आत्माएं एक * Just like a Flame of the Ges-Blower * आत्मिक प्रवाह का रूप धारण कर लेती हैं जो एक तुरिया क्रिया का प्रारूप ही दिखाई पडती है इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है, मानों पारब्रह्मं प्रमेश्वर अर्थात परम आत्मा में से सृष्टि की सभी आत्माओं के प्रवाह के आवागमन की क्रिया प्रतिक्रिया का इतनी तिव्र गति में अनुभव हो रहा हो। बहुत ही परम आनन्द की प्राप्ती होती है और ध्यान अवस्था स्थिर व गहरी होती जाती है। यह परब्रह्मं परम पिता प्रमात्मा की अपने परम भग्त पर विशेष कृपा होती है परम स्नेही भग्तजन की ऐसी अवस्था को अध्यात्म में परम हंस के नाम से सम्बोधित किया गया है।
      अध्यात्मिक सच्चाई
                                               दास अनुदास रोहतास

Friday, October 27, 2017

IS GOD'S FORM NIRAKAR OR SAKAR ? PLEASE CLARIFY

Friday, October 27, 2017
Is God (Sakar) real or (Nirakar) formless ?

Que: ---- By Shree Durgesh Giri: --- Spiritual Sea Quiz Solution at Facebook on 26-10-17 Is God (God) Real or Formless? Please clarify *****

Answer: ----By Rohtas

Shri Man ji Greetings,

                       From the spiritual point of view, according to Hinduism, there are many Divine forms of God, from whom God appears in Nirakar divine form, in the divine state, realized in internal divine Universe and manifested in physical SAKAR Real form, times after the age of the age, in this wonderful physical World, manifested itself to our ultimate affectionate bhagat Let them keep on spinning, and encourage them in the delusion, from which these two forms are special, which are shown in the following form. God, who is experienced in meditation,and by meditation, is also formless and God is also real, if God wishes, then he can also make his most exquisite, loving, beneficial person with the grace of his very beautiful Mohini form.

* 1.  Formless Form *
  

                        Therefore, God should be very special grace, manifesting in both forms can be possible. In the same way, in the present era of Kaliyug, in 1996, in the form of its beautiful, divine form, manifested in the form of "Manusham Roopam", special grace was done after some time by performing special mercy on his supreme bhakt. God is very kind and compassionate, no matter who the person is, when he is full of desire, whatever the caste community is related to the sex community, all creatures in the eyes of God, the creatures are the same, when the fulfillment of Bhogi is fulfilled, their ultimate betrayal, marriage, Divine Purush, Yogi Purush, If anybody is a believer of God, God will surely show it by doing charity and blessed by giving life absolute peace, which gives life to the creatures of ecstasy Every person who becomes Rapti it is only Uddheshya get precious life.

 * 2. Divine Sakar Form of God *
  

                 Om Namo Narayana Ji

                                                 Das Anudas Rohtas

ईश्वर (भगवान) साकार हैं या निराकार ?

Que:---- By Shree Durgesh Giri :---अध्यात्तम सागर प्रश्नोत्तरी शंका समाधान at Facebook on 26-10-17 ईश्वर (भगवान) साकार हैं या निराकार ? कृप्या स्पष्ट करें *****
Answer :----Rohtas

श्री मान जी नमस्कार,

                         श्रीमान जी, अध्यात्मिक दृष्टि से, According to Hinduism वेसे तो भगवान के अनेक दिव्य रूप हैं, जिनसे भगवान दिव्य अवस्था में अन्तर्मुख होते हुए, आन्तरिक दिव्य ब्रह्मांड में प्रकट होने पर अनुभव होते हैं और साकार रूप में भौतिक शरीर से इस अद्धभुत भोतिक संसार में, युग-युगान्तर के बाद कभी- कभार साक्षात प्रकट हो, अपने परम स्नेही भग्त जनों को दर्शन दे, उन्हें रिझाते रहते हैं, और उन्हें भग्तिमार्ग में प्रोत्साहि करते रहते हैं, जिनमें से यह दो रूप विशेष हैं जो निम्न रूप में दर्शाये गये हैं। भगवान का दिव्य रूप जो अन्तर्मुख होते हुए, ध्यान योग द्वारा अनुभव होता है, निराकार हैं और भगवान का साकार रूप भी हैं। साकार रूप को भगवान चाहें तो अपने अनन्य परम स्नेही भग्तजनों को अपने अति सुन्दर मोहिनी साकार रूप का साक्षातकार भी करा सकते हैं।

*  दिव्य निराकार रूप  *



* दिव्य साकार साक्षात रूप *



                             अत: भगवान की अति विशेष कृपा होनी चाहिये। दोनों रूपों में प्रकट होने पर प्रभू दर्शन सम्भव हो सकता हैं। भगवान वर्तमान युग कलयुग में सन् 1996 में अपने अति सुन्दर, मोहनी, दिव्य साकार रूप," मानूषं रूपं " रूप में साक्षात प्रकट हो, अपने परम भग्त पर विशेष कृपा कर, दर्शन दे कृतार्श कर, कुछ समय बाद अन्तर्ध्यान हो गये। भगवान बडे दयालू हैं, कृपालू हैं, भग्ति पूर्ण होने पर, चाहे कोई भी है, चाहे किसी भी जाती, धर्म, लिंग, समुदाय से सम्बन्ध रखने वाला हो, भगवान की नजरों में सब जीव, प्राणी, एक समान हैं। भग्ति पूर्ण होने पर अपने परम भग्त, लग्नेषू, जिज्ञाषू, दिव्य पूरुष, योगी पुरूष, कोई भी भगवान का विश्वाशपात्र होने पर, भगवान अवश्य दर्शन देते हैं और कृतार्थ कर, जीवन धन्य बना, परम शान्ती प्रदान करते हैं जिससे जीव को परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है, सो सभी प्राणियों को अनन्य भग्ति कर प्रभू को अनुभव में लाने का प्रयास करना चाहिये वो नित्य प्राप्त हैं जो हर प्राणी का यह अनमोल जीवन पाने का एकमात्र उद्धेष्य है।

                  Om Namo Narayana Ji

                                            दास अनुदास रोहतास

Wednesday, October 25, 2017

WHAT IS GITA

Que :-------What is Gita--------by Devkinondan Soni---------- facebook on 25-10-17

            


Ans:---Rohtas

                   Shree Madh Bhagavad Gita is a Spiritual  Sweet Song singing by Lord Krishna in Dawapar Yuge. Gita is essence of Vedas and Sea of Spiritual Secular Knowledge for Monks, explaining fruitless Karma-Yoga, Sankh-Yoga, Bhagti-Yoga and that all yogas are uncomplete without Meditation ,"Dhiyan-Yoga"  for Supreme Peace and enjoyments and Gita reflects to all humanity the equal rights in God-Realization.

           

                     Universal Truth

                                               Das Anudas Rohtas

What is the concept of Heaven and Hell ?

What is the concept of heaven and Hell ?

Que: ---- What is the hypothesis of heaven and hell ?

               By Aventika Tripathi .........

          
  
 Ans: -----By Shree Rohtas Ji...

Namaste ji,

                   By the  way, the meditation is the subject of the perceptual experience of a person, which can only be realized in the inner divine universe in Bhirkuti. Spiritually divine Holy souls are respected and safe in Heaven. Here in Heaven, these holy souls are owned by Indra Devata according to meditation-Yoga, while in Hell peoples live according to their bed & sinful deeds. Living souls are repleced in long ques laying down on Earth in the form of highly-miner new-born babies body, just like of a sparrow and death will take place in the body for some time in time . The purpose is to send for the movement of these organisms continues flow of this wonderful creation in Shristi .

                                                Das  Anudas Rohtas

स्वर्ग व नर्क की परिकल्पना क्या है ?

Que :------स्वर्ग व नर्क की परिकल्पना क्या है ?
By Aventika Tripathi...

Ans:----- Rohtas...

नमस्ते जी,
               वैसे तो यह ध्यानयोग द्वारा व्यकतिगत परिकाल्पनिक अनुभव का विषय है which can realized only in inner divine universe during meditation फिर भी स्वर्ग में विशेष रूप से कुछ मुख्य पुन्य दिव्य जिवात्माएं, सुक्षम शरीर से परमानन्दित व सुरक्षित रहती हैं। यहां का स्वामित्व इन्द्र देवता के पास है। योगमायाकृपानुसार , जबकि नर्क लोक में अपनें कर्मों अनुसार पुन्ह: जन्म पाने के लिये जिवात्माएं अति miner new born baby just like of a Sparrow, प्यूपा, अति सूक्षम न्यू बोर्न चिडिया के बच्चे के रूप में लम्बी कतारों में पडी हुई बिलखतीं रहती हैं और समय आने पर मृत्यु लोक में कुछ समय के लिये शरीर धारण करने हेतू भेज दिया जाता है और इन जीवों के आवागमन की क्रिया का प्रवाह यूं ही इस सृ्स्टि में, संसार में, " जिसे मृत्यू लोक के नाम से भी जाना जाता हैं " चलता आ रहा है।

                                                दास अनुदास रोहतास

Saturday, October 21, 2017

WHAT IS MORAL OF GEETA ?

WHAT IS MORAL OF GEETA ?

Que: ---- Rajesh Singh on Facebook at 3-40 am, on  19-10-2017.

Ans: - Rohtas:---

Jai Shri Krishna

                 All creatures in Shristi should doing fruitless karms at all and doing continuously meditation yoga, being Virtueless, doing exclusively devotion  multiplying for  Parimal Pershan, Lord Narayana," The God ",  & diligently seek and refuge in Him and meditate on Him, from whom has emanated this beginingless flow of creation. where the men, "soul" do not return to the world again, and get salvation, get the ultimate joy, the ultimate Peace is achieved. That is also the ultimate purpose of getting our life.
Special: -
                   Lord Shri Krishna also explained in  Shree Madhbhgwadh Geeta's, adhyen- 15 / Slokas- 3:

" I also seek and refuge  the same Adhi God -Lord Narayan."
  


                                       Das Anudas Rohtas

Thursday, October 19, 2017

WHAT IS MORAL OF GEETA ?

Que:----Rajesh Singh on  Facebook at 3-40 am, on 
19-10-2017 

Ans:-  Rohtas

जय श्री कृष्णा जी
          जीव को चाहिये, नि:श्काम् कर्म करता हुआ, ध्यान योग द्वारा, अनन्य भग्ति कर, गुणातीत हो, परिमल प्रशन्न नारायण, प्रमेश्वर, की भली भान्ति खोज कर, समर्पित हो, उसकी शरण में जाना, जहां गये हुए पुरुष, "आत्मा" फिर लौट कर संसार में नहीं आते, और मोक्ष पद्ध को प्राप्त हो, परम आनन्दित हो, परम शान्ति को प्राप्त होते हैं। जो हमारा जीवन पाने का परम उद्धेश्य भी है।
विशेष:-
             लोर्ड श्री कृष्णा also explained in Geeta, 15/3 : । " उसी आदि पुरुष नारायण के मै शरण हूं।"
  


                                             Das Anudas Rohtas

WHENEVER LORD KALKI AVATAR WILL APPEARED ?

Que:-Suresh Nama---अध्यात्तम सागर प्रसन्नोत्तरी-शंका समाधान -  Facebook 19-10-17

         

       
Ans:- By Rohtas

नमस्कार जी,
               श्री मान जी, अनन्य भग्ति कर गुणातीत हो अर्थात दिव्यता को अनुभव करने की योग्यता हो जाने पर और प्रभू कृपा हो जाने पर, आपको भगवान के अवतरित होने का भास अवश्य हो जाएगा। भगवान तो नित्य प्राप्त हैं केवल उन्हें अनुभव करना होता है। भगवान अमर हैं Immortal हैं और हर रूप में जहां चाहें, वहां, प्रकट होने की क्षमता रखते हैं। 
             जहां तक कल्की भगवान के अवतर्ण की बात है परम पद्ध अमर है वह कोई पैदा होने वाला शरीर नहीं वह तो एक immortal Divine Power जब चाही प्रकट हो गई या यूं कहिये जब भी कोई भौतिक शरीर प्रभू भग्ति करता हुआ गुणातीत हो जाता है, प्रभू कृपा होने पर दिव्य गूण, दिव्य शक्तियां, Automatically incarnated in that virtuless free body . वैसे भी कृष्णा  ने दवापर में श्रीमद्धभागवत गीता अध्यन-४-शलोकां-७-८ अनुसार घोषणा की हुई है जब जब पाप बडता है धर्म की हानी होती है और साधू समाज का शोषण होता है तब तब मैं धर्म को पुन: अच्छी तरह स्थापना करने के लिये पाप कर्मियों का विनास कर सत्य धर्म को अच्छी तरह से स्थापित कर, सभ्य समाज की रचना करने हेतू, इस पवित्र धरा पर अवतरित होता हूं।
           सो भगवान अपने अति सुन्दर, मनोहारी, सरल, साकार, मोहनी रूप ,* मानूषं रूपं * दिव्य रूप में, साक्षात इस पवित्र धरा पर, इस सुन्दर सृष्टि में, सन् 1996 में, अपने दिये गये कथनानुसार, प्रकट हो चुके हैं। अब यह नहीं पता यह कलकि हैं या कोई ओर हैं, इसका निर्णय तो धर्म के ठेकेदार या यह सनातन समाज ही करेगा जो पहले से करता आया है।  भगवान प्रकट हो चुके हैं। हमने जो नाम दिया है वह निम्न है-

                   * मोतियों वाली सरकार *

 " जाकी रही भावना जैसी प्रभू मूर्त देखीं तिन तैसी, "
 " जाकी रही भावना जैसी प्रभू मूर्त दीखे तिन तैसी। "
                         ----------------------

        * जिन खोजा तिन पाया, गहरे पानी पैठ, *
        * मैं  बपुरा बूढन डरा   रहा  किनारे  बैठ। *

                                     दास अनुदास रोहतास

Sunday, October 15, 2017

* ORA * WHAT IS ORA ?


            What is Ora
                *******
Jai Shree Krishna Ji,
Very nice Question by Satish Pandey Ji on Face-Book :-----
Answer by Rohtas on 16-10-17-at, 12-30 am:---
        



                    Ora is a divine power which we can not see with our physical eyes, we can observe with the help of our divine third eye being introvert in internal divine universe. It is a Symbol of Divinity and circulates out side of our body, we can observe it during meditation only. A " Gunateet " true devotee blessed by God with divine virtues along with Divine Ora.

             " * ORA * Is A Simbol Of Divinity "
                                  **********
                       * My Ora is Sky-Blue *

                                                      Das Anudas Rohtas

Thursday, October 12, 2017

latest Global Divine Realization

         Latest Global Divine Realization in Meditation
                               ------------------------------

           
                                             Das Anudas Rohtas

Saturday, October 7, 2017

श्री राधा कृषण जी का विवाह किसके श्राप की वजह से नहीं हुआ ?

Que :----By Puja Shukla *** प्रशन्न पूछें *** उत्तर पाएं *** शंका समाधान ** on Face-Book *******
" राधा और कृष्ण जी का विवाह किसके श्राप की वजह से नहीं हुआ।

           


Answer By Rohtas :------------

परम स्नेही भग्तजन जी,

१.             श्री राधा जी, श्री कृष्ण जी, तो प्रमाणित एक हैं, उनकी शादी का प्रशन्न नहीं उठता । जिन्होने अनुभव किया है वह जानते हैं * यह दोनों एक शक्ति के दो पहलू हैं * Supreme Divine Tatav + Supreme Divine Power जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
2.             अदध्यात्मिक दृष्टि से यह अद्धभुत सुन्दर सृष्टि के बारे अद्धयन किया जाए तो सृष्टि मात्र जल है और जल क्या है इस के बारे में सब जानते हैं Hydrogen+Oxygen=Water, दूसरी ओर हमारे शरीर रूपी सृष्टि भी पुरुष (आत्म-तत्व )+प्रकृति के मेल से ही सम्भव है। सूर्य देवता और इसमें ऊषणता का घनिष्ट सम्बन्ध है, चन्द्रमा और चन्द्रमा में शीतलता का घनिष्ट सम्बन्ध है। अध्यसत्मिक दृष्टि से सभी तथ्यों पर गहराई से प्रकाश डाला जाय तो अन्दरूनी तौर पर दिव्यता से सब एक दूसरे से जुडे हुए हैं इसी प्रकार श्री राधा कृष्ण जी भी दिव्यता के आधार पर एक हैं
3.              श्री कृष्ण विष्णु के अवतार हैं सो राधा लक्ष्मी- "शक्ति" का अवतार स्वयं हो गयी। वास्तव में यह दो दिव्य शक्तियां आदि शक्तियां हैं अध्यात्मिक दृष्टि से परम-तत्व और दिव्य रिंग जो परम-तत्व कि ही दिव्य-शक्ति "माया" है और तत्व में से ही प्रकट  हुुई  हैं, जो अलग नहीं हैं आदि काल से ही हमारे पूज्य ऋषि मुनी संतों द्वारा इस Secrecy को गुप्त रखते हुए, Hinduism में इन्हें , विष्णु-लक्ष्मी, राधा-कृष्ण, सीता राम आदि नामों से जाना जाता है। * परम दिव्य तत्व एक है, परम दिव्य शक्ति भी एक है * और सृष्टि के प्रारम्भ में यह दोनों दिव्य शक्तियां ही Automatically, Systematically and Divinelly प्रकट होती हैं उसके बाद ही इस सुन्दर सृष्टि की रचना सम्भव होती है और यहि शक्तियां अंत:कर्ण में दिव्य परम आत्म तत्व एवं  बाह्य शक्ति के रूप में दिव्य रिंग, दोनों सृष्टि में एक साथ अवतरित होती हैं इस प्रकार Scientifically भी दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं जैसे चुम्बकिय शक्ति के बिना लोहे का टुकडा चूम्बक नहीं हो सकता। यह दोनों शक्तियां हम सब के बीच में सुन्दर दिव्य लीला की रचना रचते हैं।
                                 
                    जय श्री राधा कृष्णा जी   

                   

                                            दास अनुदास रोहतास

Tuesday, October 3, 2017

What is Tatav ?

Qes;------*** तत्व क्या है ? ***Face-book*** 1- Octuber,17

Answer by Rohtas:-----

श्री मान जी,

                   वैसे तो तत्व बहुत हैं अध्यात्मिक दृष्टि से, ये निम्न सात तत्व मेन हैं, प्रकृति के पांच तत्व- आकाश, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वि, छटा तत्व आत्म तत्व सुक्ष्म बिन्द," as Dot " है, जिसके बिना यह सुन्दर सृष्टि अधूरी है, और सातवां तत्व दिव्य परम आत्म तत्व," चेतन तत्व " है।

                                                   दास अनुदास रोहतास