Monday, August 21, 2017

हमें अपने जीवन में श्री राम चरित्र अपनाना चाहिये रावण का नहीं

Ritish Kumar Gupta Ji----Facebook .....श्री गोरव कृष्ण गोस्वामी पूज्य सद् गुरूदेव जी     Alon Rock ......

           

Answer by Rohtas:--------

नमस्ते जी,
                 श्रीमान जी, संक्षिप्त में लिखना चाहूंगा, यह घटना हजारों सालों से नाटकों द्वारा फिलमों में दिखाते आ रहे हैं जिससे यह घटना लोगों के हृदय में अच्छी तरह घर बना चुकी है। देखिये गलति तो प्राकृतिक शरीर से किसी कारण वश हो जाती है। यह बहुत पुरानी एक एतिहासिक घटना दर्शाई गई है। फिर भी श्री राम चन्द्र जी यहां विष्णु के अवतार थे और दिव्यता अनुसार आज भी हैं यह किसी को अंतिम समय तक मालूम नहीं था सिवाय श्री कौशल्या जी को छोड कर, राजा दशरथ धर्म जो धरम के अवतार थे जिसने अपने कलेजे के टुकडे को दुर्वासा ऋषी के कहने योग शिक्षा लेने विशिष्ट जी के आश्रम में भेज दिया गया।  कारण वश यूवा अवस्था में वे लोग वनों में चले गये जहां पर सरूपणखा के नाक काटने की घटना मजबूर्न क्रोध वस वहां घटित हुई, अति सुन्दर नौजवान होते हुए भी अपने जीवनकाल में श्री राम जी ने कभी किसी पराई स्त्री की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा  और समस्त जीवन एक पतिवर्त धर्म अपनाया। सरूपनखा एक जिद्धी राजकुमारी थी और लक्षमन को दिल दे बैठी लेकिन लक्षमन जी सात्विक राजकुंअर थे वह इस बात को पसन्ध नहीं करते थय जिससे क्रोध के कारण सरूपन्खां नाक काट दिया,," तो यहां भी श्री राम जी की गलती नहीं यह तो लक्षमनजी से क्रोधवस हुआ।" यही रामायण की युद्ध रूपी महान घटना का कारण बना। लेकिन यहां पर आप देखिये," श्री राम जी का कोई दोष नहीं था लेकिन कारण बना। समय रहते श्री राम चन्द्र जी मायावी सुनहरी मृग के पीछे चले गये वहां पर लक्षमन जी की सुरक्षा में सीता जी को छोडा हुआ था लक्षमन जी सीता जी को अकेले छोड कर श्री राम जी की तलास में चले गये और रावन अपनी सीता स्वैम्बर और सरूपनखा वाली घटना को मद्यनजर रख, सीता जी का अपहर्ण करने की घटना को अंजाम दिया। " देखिये यहां पर देवी सीता जी का क्या दोष था यहां सीता देवी जी के साथ बहुत धोका हुआ। और यहां पर रावण को सबने समझाया लकिन रावण में अपनी शक्ति प्रदर्शन को ले कर और विद्धवान होने के अहम भाव को लेकर, अपनी हबस का शिकार बनाने के लिये क्रोधित हो, जिद्धीपन होते कीसी की बात नहीं मानी जिससे यह भयंकर प्रणाम भुगतना पडा सीता जी का कोई आज भी दोष बताने की कृपा करें । अब जहां तक श्री राम जी बात हैं वह त्रेता युग में मर्यादा प्रसोत्तम राम के अवतार थे। अब ये अवतार विंग क्या होता है यह या तो भगवान जानते हैं क्योंकि भगवान अंतर्यामी होते हैं या फिर जिस शरीर में भगवान की परा शक्ति अवतरित होती है जैसे कि हमारे राम वह जानते हैं ," बन्दर क्या जाने अद्धर्क का स्वादग " अर्थात आम आदमी की सूझ से बाहर का विषय है। जब से पैदा हुए अवतार धारण किया बचपन से लेकर अंत तक मर्यादा निभाते रहे, कभी ऊपर आंख उठा कर भी नहीं देखा। जीते हैं लेकिन जीवन क्या है इन महान आत्माओं को कुछ पता नहीं होता।आप श्री राम जी की हर मर्यादा को गहराई से लें, जैसा कि बचपन मे योग विद्धा सीखने गुरू की आज्ञा का पालन करने राज महल का सुख त्याग लक्षमन सहित वनों मे गये सारी जवानी मां बाप की आज्ञा का पालन कर घर का त्याग कर मर्यादा का पालन किया ,फि्र भाई पत्नी सहित नव नवहेली दुल्हन के साथ मां बाप केकै के कहने पर घर का त्याग सभी सुखों का त्याग कर वनों में राजा जनक की राजदुलारी का त्याग यह सब मर्यादा निभाने के लिये ही किया। श्री राम चन्द्र जी ने राक्षषों का वद्ध किया सति अनूसूइया को संजीवत किया आदि ये सब समस्त मानव जाति की भलाई के लिये ही किया।
         अब बात है सीता जी की अग्नि परिक्षा और सीता जी का परित्याग । श्री राम चन्द्र जी एक राजा थे उनके राजकाल में अमीर गरीब छोटे बडे का कोई भेद भाव न था अपनी प्रजा को सर्वोच्य मानते हर प्राणी को आदर भाव से देखते थे, तभी एक प्रजापत के कहने पर अपनी प्रिय: अर्धंगनी सीता माता का अग्नि परिक्षा लेने के बावजूद भी त्याग कर दिया। एक बात ध्यान रहे यह उनका पति पत्नि का आपस का मामला भी है कोई दोष का कारण नही बनता श्री राम जी निर्दोष हैं अध्यात्मिकता से लें तो आत्मा को दुखाना गलत है भगवान अवश्य पश्चाताप करेंगे और शायद कर भी लिया हो।
विशेष :- 
हम मानते हैं जब सीता जी की अग्नि परिक्षा हो गई तो श्री राम चन्द्र जी को एक मामूली आदमी के कहने पर सीता जी का परित्याग नहीं करना चाहिये था।फिर भी श्री राम जी ने समाजिक मर्यादा को ध्यान में रख कर जानकी जी का परित्याग किया। राम जी एक महान आत्मा हैं चाहते वह उसी समय पश्चाताप कर लेते लेकिन वह अन्तर्यामी हैं उन्होने ऐसा नहीं किया ताकि वह फिर से हमारे बीच सृस्टि के स्वसमित्व का भार अवश्य सम्भालेंगे।

* होन हार भावी प्रभल, कहत भिलख मुनी हाथ,
  जीवन मर्ण लाभ हानी यश अपयश विधी हाथ। *

           अर्थात होता वही जो भगवान ने रच रखा है। दूसरी और ऐसा न होता तो भगवान दुबारा अवतार केसे लेते। श्री राम जी ने दवापर युग में भी अवतार लिया श्री कृष्ण के रूप में और श्री राम चन्द्र जी ने कलयुग में भी अवतार धारण करना है या कर लिया है और अपने इस अवतारी काल में श्री राम जी सीता जी को जो त्रेतायुग में अग्नि परिक्षा ली थी का पश्चाताप कर सीता जी से अपनी गलती की माफी मांगेंगें । लेकिन यह सब मर्यादा के रहते ही हुआ है और हो रहा है।।
             दूसरी ओर श्री राम जी की कोई गलती नहीं। लक्षमन जी ने सुरक्षा रेखा सीता जी की रक्षा के लिये खींची , सीता जी ने रावण की बातों में आकर लक्षमन रेखा का उलंगन किया और रेखा पार की जिसकी वजय से रावन ने सीता जी का अपहर्ण किया और श्री राम जी , लक्षमन सहित समस्त परिवार ने सीता जी के लिये और अपनी मर्यादा को निभाने के लिये क्या क्या का न सहा । समस्त जीवन सीता जी की याद और रक्षा मे ही बिताया। दूसरी और जहां तक रावण की बात है, शुरू में रावण एक विदू्आन महपुरुष थे, राजदरबारों अच्छी ख्याती प्राप्त थी, देवी देवताओं से अनन्य भग्ति कर अच्छी शक्तियां आशिर्वाद रूप में प्राप्त थीे  लेकिन बाद में अहमभाव के कारण एक के बाद एक गलतियां की जैसा कि श्री शिव भगवान से दक्षिणा के रूप में लंका को मांगना आदि। बाद में रावण एक चरित्रहीन, दुराचारी, पापी, अधर्मी, कपटी राजा कहलाया। वह पराई स्त्रियों के साथ गमन करता और गलत नजर से देखता,और अपने समय में साधू संतों ऋषियों मुनियो के खून तक का प्यासा था, और देवी सीता माता जी तक का उसने अपहर्ण किया, जिससे युद्ध का कारण बना और श्री राम जी ने अपनी प्रतिज्ञा-नुसार जीते जी आराम नहीं किया, जब तक रावण रूपी राक्षष का वद्ध नहीं हुआ।

     *  Lord Shree Ram Ji is Virtuless ( Gunateet ) a Holy-Supreme-Soul, while Ravana is Virtuous. *

            वास्तव में यह एक दिव्य एतिहासिक अध्यात्मिक घटना है जो हमारे ऋषियों मुनियों ने समाज में मर्यादा में रह कर कैसे जीवन व्यतीत करना है यहां दर्शाया, और समाज में रहते हुए दु:ख सुख को सहन करते हुए, मर्यादा में रहते हुए, सात्विकता को अपना कर सद्गुणों का सहारा ले, अनन्य भग्ति कर श्री भग्वान जो हमें नित्य प्राप्त हैं हमारे हृद्यया में वास करते हैं का अनुभव कर परम आनन्द की प्राप्ती कर, परम शान्ति को को पाते हुए, परम धाम का सुख भोगना है जो हमारे जीवन का परम लक्ष है।

   * इस लिये अपने जीवन में हमें श्री राम चरित्र को अपनाना चाहिये रावण का नहीं *

            वर्तमान युग कलयुग में भी लार्ड श्री कृष्णा द्वारा दवापर युग में दिये गये अपने कथनानुसार जैसा के अध्याय 4,-सलोका, 7-8, में दिया गया है, जब पाप बडता है, धर्म की हानी होती है, अधर्म की वृधी होती है, तब तब में अपने रूप को रचता हूं और साकार रूप में प्रकट होता हूं, ऐसे समय में मैं साधू पुरुषों का उद्धार  कर, पापियों का विनास करता हूं। धर्म को पुनं: अच्छी तरह स्थापना करने के लिये प्रकट होता हूं। को पूरा करने के लिये सन् 1996 में अपने अति सुन्दर, मोहनी,  दिव्य साकार रूप, " मानूषं-रूपं " रूप में साक्षात प्रकट हो चुके हैं। इस प्रकार अवगुणो के विरोध में और सद्गुणो को पाने कै लिये अध्यात्मिक जीवन का यह संधर्ष तो जब तक सृष्टि है यूं ही चलता रहेगा फिर भी हमें सद्धगुणो को अपना कर, मर्यादा में रहते हुए,परम भग्ति कर, जीवन व्यतीत करना चाहिये। जिससे जीवन में  शान्ती प्राप्त हो सकेगी और विष्व में शान्ती प्रदान हो सकेगी, जो हम सब प्राणियो का एकमात्र उद्धेश्य है।
      जय श्री राम जी
                       ॐ शान्ती ॐ
                                   दास अनुदास रोहतास

No comments:

Post a Comment