Wednesday, November 7, 2018

What do you mean by Avtari Purush

Que   अब प्रशन्न उठता है................
           अवतारी पुरुष से अभिप्राय क्या है ?

Answer  by  Rohtas:---------

                 * सर्वश्रेष्ठ योगी श्री रोहतास जी *


श्री मान जी नमस्ते,                                                        

          जब यहां इस अद्धभुत सुन्दर संसार में प्राणी भगवान पर ही शकां करने लगते हैं कि क्या भगवान हैं, तो अवतारी पुरुष के बारे में शंका करना तो और भी आसान हो जाता है !

   * उधारण के तौर पर,  समुद्र क्या है कोई बताय ? *

             सबसे पहले यह जानने के लिये हमें पानी की जो बून्द है और उससे पहले भगवान ने जो wonderful universe की रचना की उसमे अनेक प्रकार के तत्वों की जो रचना हुई उन्हे तात्विकता से लेना होगा, उनको जानना पडेगा जैसा कि hydrogen + oxigen गैसों के मिलने से पानी बनता है, उससे हवा का दबाव बनता है हवा में Moisture बढता है फिर बादल बनते हैं उनके आपस मे मिलने से पानी की एक बून्द तैयार होती है और फिर प्रकृति के नीयम अनुसार नीचे बरस पडती है आदि आदि यह क्रम: से सब जानना पडेगा ! इस प्रकार इसका अपना अस्तित्व क्या है, देखिये समुद्र एक बहुत बडे पृथ्वि के हिस्से पर बहुत बडी तादाद में पानी इकट्ठा हो जाता है उसे समुद्र कहते हैं लेकिन यह पानी आया कहां से। समुद्र में पानी का अपना स्रोत क्या है , अब देखिये भगवान ने कृपा की, आसमान में बादल बना, बारिस शुरु हुई, एक-एक बून्द पानी से तलाब बना, यह over flow हुआ, फिर नाली बनी, फिर नाला बना, फिर नदिया बनी और फिर यह पृथ्वि का वह निचला हिस्सा जहां पर चारों और से यह नदिया नाले सभी एक जगह आकर गिरे,  जिन्होने पृथ्वि पर इकट्ठा होने पर समुद्र कैसा एक भयंकर रूप बना लिया।

                दूसरी ओर अब आप देखिये अवतार या भगवान का अवतार क्या है किसी अवतार को जानने के लिये भी हमें तात्विकता से जानना होगा। उसका क्या अस्तित्व है उह भी भगवान की कृपा है जो किसी एक विशेष जीव- प्राणी, एक कृपा पात्र पर होती है। हम सब भगवान के एक मात्र अंश ही तो हैं किसी एक जीव पर कृपा होने पर वह एक एक बून्द रूपी viveka रूपी दिव्य शक्ति का अनुभव होने पर अन्य दिव्य शक्तियों पर योग करता हुआ अपने व्यक्तिगत दिव्य अनुभवों द्वारा अपने अन्दर जो प्रभू अंशी परम आत्म तत्व के रूप में विद्धमान है से भी योग होने पर धीरे धीरे परम दिव्य गुणों व शक्तिओं को अपने में विकसित कर लेता है और अनुभवों का बहुत विस्तार होने पर एक समूद्र की तरह बहुत गहरा और महान दिव्य शक्तियों का अनुभव करता है और यह शक्तिया अनुभव होने लग्ति हैं और जिस भी जीव या प्राणी मे प्रभू कृपा होने पर प्रभू जी के दिव्य गुण और यह दिव्य शक्तियां अवतरित होती हैं वह एक अवतारी पुरुष कहलाने का गौरव प्राप्त कर लेता है जिसे सब भान होता है पर वह बाह्य रूप से जाहिर नहीं होने देता। लेकिन ध्यान रहे," * यह सब भगवान की ही कृपा से अनुभव प्राप्त होता है जब तक मालिक की कृपा होती है यह दिव्यता तब तक ही बनी रहती है अत: यहां इस सुन्दर सृष्टि में जो जहां तक हम अनुभव करने की क्षमता रखते हैं सब भगवान की ही कृपा है*"
 विशेष:-----
                "  जिस प्रकार पानी को Purifying कर शुद्ध किया जा सकता ठीक उसी प्रकार हम अनन्य भग्ति द्वारा चिन्तन करता हुआ प्राणी जीवात्मा, आत्मतत्व को शुद्धीकर्ण करता हुआ Supreme Soul, परम पिता प्रमात्मा से योग कर सकता है "

       * मेरा मुझ में किछ नहीं जो कुछ है सब तेरा *

                देखने में एक अवतारी पुरुष साधारण पुरुष ही लगता है देखिये भौतिक यानी संसारिक दृष्टि से हम संसार को अवलोकन कर सकते है लेकिन दिव्य शक्तियों को तो केवल हम दिव्यता प्राप्त होने पर ही अनुभव कर सकते हैं जो हमें गहरी अनन्य भग्ति करने और प्रभू जी की विशेष कृपा होने पर ही हो सकता है। और कोई दिव्य नेत्र धारी पुरुष ही अपने दिव्य अनुभव द्वारा पहचान सकता है कि यह एक अवतारी पुरुष है। क्योंकि अवतारी पुरूष भगवान की कृपा का विशेष दिव्य पात्र होता है। उसके शरीर के बाह्य हिस्से पर दिव्य Ora होता है, Vivek Divine Power होती है जो एक Divine Ring के रूप मे चक्रित होती है और Divine Light होती है जो कभी कभी प्रकट भी हो जाया करती है जिसे प्रभ-ज्योत के नाम से जाना जाता है। कभी कभी रंग परिवर्तन से भी जाना जा सकता है या फिर उसके सम्पर्क में आकर request करने पर अगर वह कृपा करे तो अपने अनुभवों का जो knowledge होता है उसको जानने से  लग सकता है कि यह कोई अवतरी पुरुष हो सकता है।

           अत: जिस प्रकार समूद्र का अपना कोई अस्तिव नही सब प्रभू कृपा है ठीक उसी प्रकार अवतार का भी कोई अपना अस्तित्व नहीं, सब भगवान की ही कृपा होती है वैसे भी देखा जाए तो यहां इस संसार मे किसी भी वस्तू जीव या प्राणी का अपना कोई अस्तित्व नहीं है यह सब भगवान की माया जिसके बारे में आजतक कोई भी नहीं जान पाया है।  यह समस्त सृष्टि ही भगवान की अद्धभुत दिव्य रचना है

         अब देखिये हम सब ने बाहर पार्क या खुले मैदान में गर्मियों के दिनों ज्यादातर हवा का दबाव बनने पर बावरोला बनते देखा है लेकिन क्या इसका अपना को स्थाई अस्तित्व है, नहीं, फिर भी Automatically हवा का दबाव बना और बावरोला बन गया और धीरे धीरे एक भयंकर खतर्नाक भवंडर का रूप धारण कर लिया। ऐसे ही ब्रह्मांड मे भी बनते हैं समुद्र में भी बनते हैं और पृथ्वि में भी Cyclone के रूप मे ये सक्रिय हो जाते हैं ठीक, जिस प्रकार यह सब होता है उसी प्रकार समय आने पर जब कोई आत्म तत्व जो सभी जीव प्राणियों को नित्य प्राप्त है जो सच्चिद्धानन्द प्रभू ईश्वर की देन है सब के हृदय में विद्यमान है प्रभू कृपा होने पर पीछे सुझाई गयी सभी अध्यात्मिक क्रियाओं के जीवन में लगातार प्रैक्टिस करते हुए अनन्य भग्तिमय योग करने पर Tatav Activation होने पर एक परम भग्त, जिज्ञाषू अपने जीवन में सभी आलौकिक - परलोकिक दिव्य शक्तियों को अनुभव में कर लेता है और परम आत्म तत्व से योग कर भगवान से योग करता हुआ, परमानन्दित्त होता हुआ, प्रभू कृपा होने पर उसका जीवन धन्य हो जाता है। हम सब प्राणियों का यही एकमात्र परम उद्धेश्य है।

     " अत: भगवान तो भगवान हैं  प्रभू कृपा होने पर सब कुछ अनुभव होने के बाद व जान लेने के बाद भी प्राणी को अपने आपको भगवान नहीं समझना चाहिये भगवान की कृपा का विशेष पात्र * कृपापात्र * मानने की योग्यता हो जाती है "

             परम स्नेहि भग्त जनों,  प्रिय भारत देश एक दिव्य देश हैं इस पवित्र दिव्य धरा पर ऋषि मुनि संत दिव्य पुरुष योगी पुरुष होते आए हैं और कभी कभी युग युगान्तर के बाद परम शक्ति भी यहां अवतारी पुरुष के रूप में शरीर धारण कर लेती है जैसा की सतयुग में धर्मावतार श्री हरीष्चन्द्र जी, त्रेता में श्री राम चन्द्र जी पुरुषोत्तम पुरुष के अवतार हुए दवापर में श्री कृष्णा जी परम पुरुष के अवतार हुए और अब कलयुग में भी भगवान की परम दिव्य शक्ति ने हम सब के बीच में इस पवित्र धरा पर इस सुन्दर सृष्टि में अवतार धारण किया हुआ है। हम सब प्राणियों को चाहिये अनन्य भग्ति करते हुए, उस परमपिता प्रमात्मा NARAYANA की भली भांती खोज कर जिसने इस सुन्दर सृष्टि की रचना की, और जिससे इस सुन्दर सृष्टि की रचना का यह Beginning less प्रवाह प्रकट हो रहा है जहां पहुंचने पर आंशिक आत्म- तत्व फिर से इस मृत्यु लोक में भटकने हेतू  वापिस नहीं आता । जो इस सुन्दर सृष्टि की " आदि अंत और मध्य " तीनों अवस्थाओं का मालिक है इस परम-धाम का मालिक है,  उसमें  पूर्णत: समर्पित होते हुए, उसकी शरण में जाएं  और परम शान्ति प्राप्त कर, परम आनन्द को प्राप्त हों।

                            ॐ तत् सत्

                                              दास अनुदास रोहतास

1 comment:

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